मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
bṛhat-sāma tathā sāmnāṁ
gāyatrī chandasām aham
māsānāṁ mārga-śīrṣo ’ham
ṛtūnāṁ kusumākaraḥ
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तात्पर्य पढ़ें
जैसा कि भगवान् स्वयं बता चुके हैं, वे समस्त वेदों में सामवेद हैं । सामवेद विभिन्न देवताओं द्वारा गाये जाने वाले गीतों का संग्रह है । इन गीतों में से एक बृहत्साम है जिसकी ध्वनि सुमधुर है और जो अर्धरात्रि में गाया जाता है ।
संस्कृत में काव्य के निश्चित विधान हैं । इसमें लय तथा ताल बहुत सी आधुनिक कविता की तरह मनमाने नहीं होते । ऐसे नियमित काव्य में गायत्री मन्त्र, जिसका जप केवल सुपात्र ब्राह्मणों द्वारा ही होता है, सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है । गायत्री मन्त्र का उल्लेख श्रीमद्भागवत में भी हुआ है । चूँकि गायत्री मन्त्र विशेषतया ईश्वर-साक्षात्कार के ही निमित्त है, इसीलिए यह परमेश्वर का स्वरूप है । यह मन्त्र अध्यात्म में उन्नत लोगों के लिए है । जब इसका जप करने में उन्हें सफलता मिल जाती है, तो वे भगवान् के दिव्य धाम में प्रविष्ट होते हैं । गायत्री मन्त्र के जप के लिए मनुष्य को पहले सिद्ध पुरुष के गुण या भौतिक प्रकृति के नियमों के अनुसार सात्त्विक गुण प्राप्त करने होते हैं । वैदिक सभ्यता में गायत्री मन्त्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और उसे ब्रह्म का नाद अवतार माना जाता है । ब्रह्मा इसके गुरु हैं और शिष्य-परम्परा द्वारा यह उनसे आगे बढ़ता रहा है ।
मासों में अगहन (मार्गशीर्ष) मास सर्वोत्तम माना जाता है क्योंकि भारत में इस मास में खेतों से अन्न एकत्र किया जाता है और लोग अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं । निस्सन्देह वसन्त ऐसी ऋतु है जिसका विश्वभर में सम्मान होता है क्योंकि यह न तो बहुत गर्म रहती है, न सर्द और इसमें वृक्षों में फूल आते हैं । वसन्त में कृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित अनेक उत्सव भी मनाये जाते हैं, अतः इसे समस्त ऋतुओं में से सर्वाधिक उल्लासपूर्ण माना जाता है और यह भगवान् कृष्ण की प्रतिनिधि है ।