इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥
ahaṁ sarvasya prabhavo
mattaḥ sarvaṁ pravartate
iti matvā bhajante māṁ
budhā bhāva-samanvitāḥ
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तात्पर्य पढ़ें
जिस विद्वान ने वेदों का ठीक से अध्ययन किया हो और भगवान् चैतन्य जैसे अधिकारियों से ज्ञान प्राप्त किया हो तथा यह जानता हो कि इन उपदेशों का किस प्रकार उपयोग करना चाहिए, वही यह समझ सकता है कि भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों के मूल श्रीकृष्ण ही हैं । इस प्रकार के ज्ञान से वह भगवद्भक्ति में स्थिर हो जाता है । वह व्यर्थ की टीकाओं से या मूों के द्वारा कभी पथभ्रष्ट नहीं होता । सारा वैदिक साहित्य स्वीकार करता है कि कृष्ण ही ब्रह्मा, शिव तथा अन्य समस्त देवताओं के स्रोत हैं । अथर्ववेद में (गोपालतापनी उपनिषद् १.२४) कहा गया है - यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च गापयति स्म कृष्णः - प्रारम्भ में कृष्ण ने ब्रह्मा को वेदों का ज्ञान प्रदान किया और उन्होंने भूतकाल में वैदिक ज्ञान का प्रचार किया । पुनः नारायण उपनिषद् में (१) कहा गया है - अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति - तब भगवान् ने जीवों की सृष्टि करनी चाही । उपनिषद् में आगे भी कहा गया है - नारायणाद् ब्रह्मा जायते नारायणाद् प्रजापतिः प्रजायते नारायणाद् इन्द्रो जायते । नारायणादष्टौ वसवो जायन्ते नारायणादेकादश रुद्रा जायन्ते नारायणाद्द्वादशादित्याः - “नारायण से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, नारायण से प्रजापति उत्पन्न होते हैं, नारायण से इन्द्र और आठ वसु उत्पन्न होते हैं और नारायण से ही ग्यारह रुद्र तथा बारह आदित्य उत्पन्न होते हैं ।” यह नारायण कृष्ण के ही अंश हैं ।
वेदों का ही कथन है - ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रः - देवकी पुत्र, कृष्ण, ही भगवान् हैं (नारायण उपनिषद् ४) । तब यह कहा गया - एको वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा न ईशानो नापो नाग्निसमौ नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यः - सृष्टि के प्रारम्भ में केवल भगवान् नारायण थे । न ब्रह्मा थे, न शिव । न अग्नि थी, न चन्द्रमा, न नक्षत्र और न सूर्य (महा उपनिषद् १) । महा उपनिषद् में यह भी कहा गया है कि शिवजी परमेश्वर के मस्तक से उत्पन्न हुए । अतः वेदों का कहना है कि ब्रह्मा तथा शिव के स्रष्टा भगवान् की ही पूजा की जानी चाहिए ।
मोक्षधर्म में कृष्ण कहते हैं –
तौ हि मां न विजानीतो मम मायाविमोहितौ ॥
तस्माद्रुद्रोऽभवद्देवः स च सर्वज्ञतां गतः ॥