अध्याय १३ - श्लोक २८

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २८ ॥

samaṁ sarveṣu bhūteṣu
tiṣṭhantaṁ parameśvaram
vinaśyatsv avinaśyantaṁ
yaḥ paśyati sa paśyati


जो परमात्मा को समस्त शरीरों में आत्मा के साथ देखता है और जो यह समझता है कि इस नश्वर शरीर के भीतर न तो आत्मा, न ही परमात्मा कभी भी विनष्ट होता है, वही वास्तव में देखता है ।

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तात्पर्य पढ़ें
जो व्यक्ति सत्संगति से तीन वस्तुओं को - शरीर, शरीर का स्वामी या आत्मा, तथा आत्मा के मित्र को - एकसाथ संयुक्त देखता है, वही सच्चा ज्ञानी है । जब तक आध्यात्मिक विषयों के वास्तविक ज्ञाता की संगति नहीं मिलती, तब तक कोई इन तीनों वस्तुओं को नहीं देख सकता । जिन लोगों की ऐसी संगति नहीं होती, वे अज्ञानी हैं, वे केवल शरीर को देखते हैं, और जब यह शरीर विनष्ट हो जाता है, तो समझते हैं कि सब कुछ नष्ट हो गया । लेकिन वास्तविकता यह नहीं है । शरीर के विनष्ट होने पर आत्मा तथा परमात्मा का अस्तित्व बना रहता है, और वे अनेक विविध चर तथा अचर रूपों में सदैव जाते रहते हैं । कभी-कभी संस्कृत शब्द परमेश्वर का अनुवाद जीवात्मा के रूप में किया जाता है, क्योंकि आत्मा ही शरीर का स्वामी है और शरीर के विनाश होने पर वह अन्यत्र देहान्तरण कर जाता है । इस तरह वह स्वामी है । लेकिन कुछ लोग इस परमेश्वर शब्द का अर्थ परमात्मा लेते हैं । प्रत्येक दशा में परमात्मा तथा आत्मा दोनों रह जाते हैं । वे विनष्ट नहीं होते । जो इस प्रकार देख सकता है, वही वास्तव में देख सकता है कि क्या घटित हो रहा है ।