अध्याय १६ - श्लोक ७

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥

pravṛttiṁ ca nivṛttiṁ ca
janā na vidur āsurāḥ
na śaucaṁ nāpi cācāro
na satyaṁ teṣu vidyate


जो आसुरी हैं, वे यह नहीं जानते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए । उनमें न तो पवित्रता, न उचित आचरण और न ही सत्य पाया जाता है ।

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तात्पर्य पढ़ें

प्रत्येक सभ्य मानव समाज में कुछ आचार-संहिताएँ होती हैं, जिनका प्रारम्भ से पालन करना होता है । विशेषतया आर्यगण, जो वैदिक सभ्यता को मानते हैं और अत्यन्त सभ्य माने जाते हैं, इनका पालन करते हैं । किन्तु जो शास्त्रीय आदेशों को नहीं मानते, वे असुर समझे जाते हैं । इसीलिए यहाँ पर कहा गया है कि असुरगण न तो शास्त्रीय नियमों को जानते हैं, न उनमें इनके पालन करने की प्रवृत्ति पाई जाती है । उनमें से अधिकांश इन नियमों को नहीं जानते और जो थोड़े से लोग जानते भी हैं, उनमें इनके पालन करने की प्रवृत्ति नहीं होती । उन्हें न तो वैदिक आदेशों में कोई श्रद्धा होती है, न ही वे उसके अनुसार कार्य करने के इच्छुक होते हैं । असुरगण न तो बाहर से, न भीतर से स्वच्छ होते हैं । मनुष्य को चाहिए कि स्नान करके, दंतमंजन करके, बाल बना कर, वस्त्र बदल कर शरीर को स्वच्छ रखे । जहाँ तक आन्तरिक स्वच्छता की बात है, मनुष्य को चाहिए कि वह सदैव ईश्वर के पवित्र नामों का स्मरण करे और हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करे । असुरगण बाह्य तथा आन्तरिक स्वच्छता के इन नियमों को न तो चाहते हैं, न इनका पालन ही करते हैं ।

जहाँ तक आचरण की बात है, मानव आचरण का मार्गदर्शन करने वाले अनेक विधि-विधान हैं, जैसे मनु-संहिता, जो मानवजाति का अधिनियम है । यहाँ तक कि आज भी सारे हिन्दू मनुसंहिता का ही अनुगमन करते हैं । इसी ग्रंथ से उत्तराधिकार तथा अन्य विधि सम्बन्धी बातें ग्रहण की जाती हैं । मनुसंहिता में स्पष्ट कहा गया है कि स्त्री को स्वतन्त्रता न प्रदान की जाय । इसका अर्थ यह नहीं होता कि स्त्रियों को दासी बना कर रखा जाय । वे तो बालकों के समान हैं । बालकों को स्वतन्त्रता नहीं दी जाती, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वे दास बना कर रखे जाते हैं । लेकिन असुरों ने ऐसे आदेशों की उपेक्षा कर दी है और वे सोचने लगे हैं कि स्त्रियों को पुरुषों के समान ही स्वतन्त्रता प्रदान की जाय । लेकिन इससे संसार की सामाजिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ । वास्तव में स्त्री को जीवन की प्रत्येक अवस्था में सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए । उसके बाल्यकाल में पिता द्वारा संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए, तारुण्य में पति द्वारा और बुढ़ापे में बड़े पुत्रों द्वारा । मनु-संहिता के अनुसार यही उचित सामाजिक आचरण है । लेकिन आधुनिक शिक्षा ने नारी जीवन का एक अतिरंजित अहंकारपूर्ण बोध उत्पन्न कर दिया है, अतएव अब विवाह एक कल्पना बन चुका है । स्त्री की नैतिक स्थिति भी अब बहुत अच्छी नहीं रह गई है । अतएव असुरगण कोई ऐसा उपदेश ग्रहण नहीं करते, जो समाज के लिए अच्छा हो । चूँकि वे महर्षियों के अनुभवों तथा उनके द्वारा निर्धारित विधि-विधानों का पालन नहीं करते, अतएव आसुरी लोगों की सामाजिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय है ।