अध्याय १८ - मोक्षसंन्यासयोग

Chapter 18 - Mokṣa Saṃnyāsa Yoga

उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

कृष्ण वैराग्य का अर्थ और मानवीय चेतना तथा कर्म पर प्रकृति के गुणों का प्रभाव समझाते हैं । वे ब्रह्म-अनुभूति, भगवद्गीता की महिमा तथा भगवद्गीता के चरम निष्कर्ष को समझाते हैं । यह चरम निष्कर्ष यह है कि धर्म का सर्वोच्च मार्ग भगवान् कृष्ण की परम शरणागति है जो पूर्ण प्रकाश प्रदान करने वाली है और मनुष्य को कृष्ण के नित्य धाम को वापस जाने में समर्थ बनाती है ।

76 श्लोक हिं · Eng उपलब्ध

अध्याय १८ - श्लोक १

Chapter 18 - Verse 1
अर्जुन ने कहा - हे महाबाहु! मैं त्याग का उद्देश्य जानने का इच्छुक हूँ और हे केशिनिषूदन, हे हृषीकेश! मैं त्यागमय जीवन (संन्यास आश्रम) का भी उद्देश्य जानना चाहता हूँ ।

अध्याय १८ - श्लोक २

Chapter 18 - Verse 2
भगवान् ने कहा - भौतिक इच्छा पर आधारित कर्मों के परित्याग को विद्वान लोग संन्यास कहते हैं और समस्त कर्मों के फल-त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते हैं ।

अध्याय १८ - श्लोक ३

Chapter 18 - Verse 3
कुछ विद्वान घोषित करते हैं कि समस्त प्रकार के सकाम कर्मों को दोषपूर्ण समझ कर त्याग देना चाहिए । किन्तु अन्य विद्वान् मानते हैं कि यज्ञ, दान तथा तपस्या के कर्मों को कभी नहीं त्यागना चाहिए ।

अध्याय १८ - श्लोक ४

Chapter 18 - Verse 4
हे भरतश्रेष्ठ! अब त्याग के विषय में मेरा निर्णय सुनो । हे नरशार्दूल! शास्त्रों में त्याग तीन तरह का बताया गया है ।

अध्याय १८ - श्लोक ५

Chapter 18 - Verse 5
यज्ञ, दान तथा तपस्या के कर्मों का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए, उन्हें अवश्य सम्पन्न करना चाहिए । निस्सन्देह यज्ञ, दान तथा तपस्या महात्माओं को भी शुद्ध बनाते हैं ।

अध्याय १८ - श्लोक ६

Chapter 18 - Verse 6
इन सारे कार्यों को किसी प्रकार की आसक्ति या फल की आशा के बिना सम्पन्न करना चाहिए । हे पृथापुत्र! इन्हें कर्तव्य मानकर सम्पन्न किया जाना चाहिए । यही मेरा अन्तिम मत है ।

अध्याय १८ - श्लोक ७

Chapter 18 - Verse 7
निर्दिष्ट कर्तव्यों को कभी नहीं त्यागना चाहिए । यदि कोई मोहवश अपने नियत कर्मों का परित्याग कर देता है, तो ऐसे त्याग को तामसी कहा जाता है ।

अध्याय १८ - श्लोक ८

Chapter 18 - Verse 8
जो व्यक्ति नियत कर्मों को कष्टप्रद समझ कर या शारीरिक क्लेश के भय से त्याग देता है, उसके लिए कहा जाता है कि उसने यह त्याग रजोगुण में किया है । ऐसा करने से कभी त्याग का उच्चफल प्राप्त नहीं होता ।

अध्याय १८ - श्लोक ९

Chapter 18 - Verse 9
हे अर्जुन! जब मनुष्य नियत कर्तव्य को करणीय मान कर करता है और समस्त भौतिक संगति तथा फल की आसक्ति को त्याग देता है, तो उसका त्याग सात्त्विक कहलाता है ।
१०

अध्याय १८ - श्लोक १०

Chapter 18 - Verse 10
सतोगुण में स्थित बुद्धिमान त्यागी, जो न तो अशुभ कर्म से घृणा करता है, न शुभकर्म से लिप्त होता है, वह कर्म के विषय में कोई संशय नहीं रखता ।
११

अध्याय १८ - श्लोक ११

Chapter 18 - Verse 11
निस्सन्देह किसी भी देहधारी प्राणी के लिए समस्त कर्मों का परित्याग कर पाना असम्भव है । लेकिन जो कर्मफल का परित्याग करता है, वह वास्तव में त्यागी कहलाता है ।
१२

अध्याय १८ - श्लोक १२

Chapter 18 - Verse 12
जो त्यागी नहीं है, उसके लिए इच्छित (इष्ट), अनिच्छित (अनिष्ट) तथा मिश्रित - ये तीन प्रकार के कर्मफल मृत्यु के बाद मिलते हैं । लेकिन जो संन्यासी हैं, उन्हें ऐसे फल का सुख-दुख नहीं भोगना पड़ता ।
१३

अध्याय १८ - श्लोक १३

Chapter 18 - Verse 13
हे महाबाहु अर्जुन! वेदान्त के अनुसार समस्त कर्मों की पूर्ति के लिए पाँच कारण हैं । अब तुम इन्हें मुझसे सुनो ।
१४

अध्याय १८ - श्लोक १४

Chapter 18 - Verse 14
कर्म का स्थान (शरीर), कर्ता, विभिन्न इन्द्रियाँ, अनेक प्रकार की चेष्टाएँ तथा परमात्मा - ये पाँच कर्म के कारण हैं ।
१५

अध्याय १८ - श्लोक १५

Chapter 18 - Verse 15
मनुष्य अपने शरीर, मन या वाणी से जो भी उचित या अनुचित कर्म करता है, वह इन पाँच कारणों के फलस्वरूप होता है ।
१६

अध्याय १८ - श्लोक १६

Chapter 18 - Verse 16
अतएव जो इन पाँचों कारणों को न मान कर अपने आपको ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह निश्चय ही बहुत बुद्धिमान नहीं होता और वस्तुओं को सही रूप में नहीं देख सकता ।
१७

अध्याय १८ - श्लोक १७

Chapter 18 - Verse 17
जो मिथ्या अहंकार से प्रेरित नहीं है, जिसकी बुद्धि बँधी नहीं है, वह इस संसार में मनुष्यों को मारता हुआ भी नहीं मारता । न ही वह अपने कर्मों से बँधा होता है ।
१८

अध्याय १८ - श्लोक १८

Chapter 18 - Verse 18
ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता - ये तीनों कर्म को प्रेरणा देने वाले कारण हैं । इन्द्रियाँ (करण), कर्म तथा कर्ता - ये तीन कर्म के संघटक हैं ।
१९

अध्याय १८ - श्लोक १९

Chapter 18 - Verse 19
प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार ही ज्ञान, कर्म तथा कर्ता के तीन-तीन भेद हैं । अब तुम मुझसे इन्हें सुनो ।
२०

अध्याय १८ - श्लोक २०

Chapter 18 - Verse 20
जिस ज्ञान से अनन्त रूपों में विभक्त सारे जीवों में एक ही अविभक्त आध्यात्मिक प्रकृति देखी जाती है, उसे ही तुम सात्त्विक जानो ।
२१

अध्याय १८ - श्लोक २१

Chapter 18 - Verse 21
जिस ज्ञान से कोई मनुष्य विभिन्न शरीरों में भिन्न-भिन्न प्रकार का जीव देखता है, उसे तुम राजसी जानो ।
२२

अध्याय १८ - श्लोक २२

Chapter 18 - Verse 22
और वह ज्ञान, जिससे मनुष्य किसी एक प्रकार के कार्य को, जो अति तुच्छ है, सब कुछ मान कर, सत्य को जाने बिना उसमें लिप्त रहता है, तामसी कहा जाता है ।
२३

अध्याय १८ - श्लोक २३

Chapter 18 - Verse 23
जो कर्म नियमित है और जो आसक्ति, राग या द्वेष से रहित कर्मफल की चाह के बिना किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है ।
२४

अध्याय १८ - श्लोक २४

Chapter 18 - Verse 24
लेकिन जो कार्य अपनी इच्छा पूर्ति के निमित्त प्रयासपूर्वक एवं मिथ्या अहंकार के भाव से किया जाता है, वह रजोगुणी कहा जाता है ।
२५

अध्याय १८ - श्लोक २५

Chapter 18 - Verse 25
जो कर्म मोहवश शास्त्रीय आदेशों की अवहेलना करके तथा भावी बन्धन की परवाह किये बिना या हिंसा अथवा अन्यों को दुख पहुँचाने के लिए किया जाता है, वह तामसी कहलाता है ।
२६

अध्याय १८ - श्लोक २६

Chapter 18 - Verse 26
जो व्यक्ति भौतिक गुणों के संसर्ग के बिना अहंकाररहित, संकल्प तथा उत्साहपूर्वक अपना कर्म करता है और सफलता अथवा असफलता में अविचलित रहता है, वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है ।
२७

अध्याय १८ - श्लोक २७

Chapter 18 - Verse 27
जो कर्ता कर्म तथा कर्म-फल के प्रति आसक्त होकर फलों का भोग करना चाहता है तथा जो लोभी, सदैव ईर्ष्यालु, अपवित्र और सुख-दुख से विचलित होने वाला है, वह राजसी कहा जाता है ।
२८

अध्याय १८ - श्लोक २८

Chapter 18 - Verse 28
जो कर्ता सदा शास्त्रों के आदेशों के विरुद्ध कार्य करता रहता है, जो भौतिकवादी, हठी, कपटी तथा अन्यों का अपमान करने में पटु है तथा जो आलसी, सदैव खिन्न तथा काम करने में दीर्घसूत्री है, वह तमोगुणी कहलाता है ।
२९

अध्याय १८ - श्लोक २९

Chapter 18 - Verse 29
हे धनञ्जय! अब मैं प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार तुम्हें विभिन्न प्रकार की बुद्धि तथा धृति के विषय में विस्तार से बताऊँगा । तुम इसे सुनो ।
३०

अध्याय १८ - श्लोक ३०

Chapter 18 - Verse 30
हे पृथापुत्र! वह बुद्धि सतोगुणी है, जिसके द्वारा मनुष्य यह जानता है कि क्या करणीय है और क्या नहीं है, किससे डरना चाहिए और किससे नहीं, क्या बाँधने वाला है और क्या मुक्ति देने वाला है ।
३१

अध्याय १८ - श्लोक ३१

Chapter 18 - Verse 31
हे पृथापुत्र! जो बुद्धि धर्म तथा अधर्म, करणीय तथा अकरणीय कर्म में भेद नहीं कर पाती, वह राजसी है ।
३२

अध्याय १८ - श्लोक ३२

Chapter 18 - Verse 32
जो बुद्धि मोह तथा अंधकार के वशीभूत होकर अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म मानती है और सदैव विपरीत दिशा में प्रयत्न करती है, हे पार्थ! वह तामसी है ।
३३

अध्याय १८ - श्लोक ३३

Chapter 18 - Verse 33
हे पृथापुत्र! जो अटूट है, जिसे योगाभ्यास द्वारा अचल रहकर धारण किया जाता है और जो इस प्रकार मन, प्राण तथा इन्द्रियों के कार्यकलापों को वश में रखती है, वह धृति सात्त्विक है ।
३४

अध्याय १८ - श्लोक ३४

Chapter 18 - Verse 34
लेकिन हे अर्जुन! जिस धृति से मनुष्य धर्म, अर्थ तथा काम के फलों में लिप्त बना रहता है, वह राजसी है ।
३५

अध्याय १८ - श्लोक ३५

Chapter 18 - Verse 35
हे पार्थ! जो धृति स्वप्न, भय, शोक, विषाद तथा मोह के परे नहीं जाती, ऐसी दुर्बुद्धिपूर्ण धृति तामसी है ।
३६

अध्याय १८ - श्लोक ३६

Chapter 18 - Verse 36
हे भरतश्रेष्ठ! अब मुझसे तीन प्रकार के सुखों के विषय में सुनो, जिनके द्वारा बद्धजीव भोग करता है और जिसके द्वारा कभी-कभी दुखों का अन्त हो जाता है ।
३७

अध्याय १८ - श्लोक ३७

Chapter 18 - Verse 37
जो प्रारम्भ में विष जैसा लगता है, लेकिन अन्त में अमृत के समान है और जो मनुष्य में आत्म-साक्षात्कार जगाता है, वह सात्त्विक सुख कहलाता है ।
३८

अध्याय १८ - श्लोक ३८

Chapter 18 - Verse 38
जो सुख इन्द्रियों द्वारा उनके विषयों के संसर्ग से प्राप्त होता है और जो प्रारम्भ में अमृततुल्य तथा अन्त में विषतुल्य लगता है, वह रजोगुणी कहलाता है ।
३९

अध्याय १८ - श्लोक ३९

Chapter 18 - Verse 39
तथा जो सुख आत्म-साक्षात्कार के प्रति अन्धा है, जो प्रारम्भ से लेकर अन्त तक मोहकारक है और जो निद्रा, आलस्य तथा मोह से उत्पन्न होता है, वह तामसी कहलाता है ।
४०

अध्याय १८ - श्लोक ४०

Chapter 18 - Verse 40
इस लोक में, स्वर्ग लोकों में या देवताओं के मध्य में कोई भी ऐसा व्यक्ति विद्यमान नहीं है, जो प्रकृति के तीन गुणों से मुक्त हो ।
४१

अध्याय १८ - श्लोक ४१

Chapter 18 - Verse 41
हे परन्तप! ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों में प्रकृति के गुणों के अनुसार उनके स्वभाव द्वारा उत्पन्न गुणों के द्वारा भेद किया जाता है ।
४२

अध्याय १८ - श्लोक ४२

Chapter 18 - Verse 42
शान्तिप्रियता, आत्मसंयम, तपस्या, पवित्रता, सहिष्णुता, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विज्ञान तथा धार्मिकता - ये सारे स्वाभाविक गुण हैं, जिनके द्वारा ब्राह्मण कर्म करते हैं ।
४३

अध्याय १८ - श्लोक ४३

Chapter 18 - Verse 43
वीरता, शक्ति, संकल्प, दक्षता, युद्ध में धैर्य, उदारता तथा नेतृत्व - ये क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण हैं ।
४४

अध्याय १८ - श्लोक ४४

Chapter 18 - Verse 44
कृषि करना, गो-रक्षा तथा व्यापार वैश्यों के स्वाभाविक कर्म हैं और शूद्रों का कर्म श्रम तथा अन्यों की सेवा करना है ।
४५

अध्याय १८ - श्लोक ४५

Chapter 18 - Verse 45
अपने अपने कर्म के गुणों का पालन करते हुए प्रत्येक व्यक्ति सिद्ध हो सकता है । अब तुम मुझसे सुनो कि यह किस प्रकार किया जा सकता है ।
४६

अध्याय १८ - श्लोक ४६

Chapter 18 - Verse 46
जो सभी प्राणियों का उद्गम है और सर्वव्यापी है, उस भगवान् की उपासना करके मनुष्य अपना कर्म करते हुए पूर्णता प्राप्त कर सकता है ।
४७

अध्याय १८ - श्लोक ४७

Chapter 18 - Verse 47
अपने वृत्तिपरक कार्य को करना, चाहे वह कितना ही त्रुटिपूर्ण ढंग से क्यों न किया जाय, अन्य किसी के कार्य को स्वीकार करने और अच्छी प्रकार करने की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है । अपने स्वभाव के अनुसार निर्दिष्ट कर्म कभी भी पाप से प्रभावित नहीं होते ।
४८

अध्याय १८ - श्लोक ४८

Chapter 18 - Verse 48
प्रत्येक उद्योग (प्रयास) किसी न किसी दोष से आवृत होता है, जिस प्रकार अग्नि धुएँ से आवृत रहती है । अतएव हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य को चाहिए कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म को, भले ही वह दोषपूर्ण क्यों न हो, कभी त्यागे नहीं ।
४९

अध्याय १८ - श्लोक ४९

Chapter 18 - Verse 49
जो आत्मसंयमी तथा अनासक्त है एवं जो समस्त भौतिक भोगों की परवाह नहीं करता, वह संन्यास के अभ्यास द्वारा कर्मफल से मुक्ति की सर्वोच्च सिद्ध-अवस्था प्राप्त कर सकता है ।
५०

अध्याय १८ - श्लोक ५०

Chapter 18 - Verse 50
हे कुन्तीपुत्र! जिस तरह इस सिद्धि को प्राप्त हुआ व्यक्ति परम सिद्धावस्था अर्थात् ब्रह्म को, जो सर्वोच्च ज्ञान की अवस्था है, प्राप्त करता है, उसका मैं संक्षेप में तुमसे वर्णन करूँगा, उसे तुम जानो ।
५१

अध्याय १८ - श्लोक ५१-५३

Chapter 18 - Verse 51-53
अपनी बुद्धि से शुद्ध होकर तथा धैर्यपूर्वक मन को वश में करते हुए, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का त्याग कर, राग तथा द्वेष से मुक्त होकर जो व्यक्ति एकान्त स्थान में वास करता है, जो थोड़ा खाता है, जो अपने शरीर मन तथा वाणी को वश में रखता है, जो सदैव समाधि में रहता है तथा पूर्णतया विरक्त, मिथ्या अहंकार, मिथ्या शक्ति, मिथ्या गर्व, काम, क्रोध तथा भौतिक वस्तुओं के संग्रह से मुक्त है, जो मिथ्या स्वामित्व की भावना से रहित तथा शान्त है वह निश्चय ही आत्म-साक्षात्कार के पद को प्राप्त होता है ।
५२

अध्याय १८ - श्लोक ५४

Chapter 18 - Verse 54
इस प्रकार जो दिव्य पद पर स्थित है, वह तुरन्त परब्रह्म का अनुभव करता है और पूर्णतया प्रसन्न हो जाता है । वह न तो कभी शोक करता है, न किसी वस्तु की कामना करता है । वह प्रत्येक जीव पर समभाव रखता है । उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है ।
५३

अध्याय १८ - श्लोक ५५

Chapter 18 - Verse 55
केवल भक्ति से मुझ भगवान् को यथारूप में जाना जा सकता है । जब मनुष्य ऐसी भक्ति से मेरे पूर्ण भावनामृत में होता है, तो वह वैकुण्ठ जगत् में प्रवेश कर सकता है ।
५४

अध्याय १८ - श्लोक ५६

Chapter 18 - Verse 56
मेरा शुद्ध भक्त मेरे संरक्षण में, समस्त प्रकार के कार्यों में संलग्न रह कर भी मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को प्राप्त होता है ।
५५

अध्याय १८ - श्लोक ५७

Chapter 18 - Verse 57
सारे कार्यों के लिए मुझ पर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो । ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो ।
५६

अध्याय १८ - श्लोक ५८

Chapter 18 - Verse 58
यदि तुम मुझसे भावनाभावित होगे, तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघ जाओगे । लेकिन यदि तुम मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम विनष्ट हो जाओगे ।
५७

अध्याय १८ - श्लोक ५९

Chapter 18 - Verse 59
यदि तुम मेरे निर्देशानुसार कर्म नहीं करते और युद्ध में प्रवृत्त नहीं होते हो, तो तुम कुमार्ग पर जाओगे । तुम्हें अपने स्वभाववश युद्ध में लगना होगा ।
५८

अध्याय १८ - श्लोक ६०

Chapter 18 - Verse 60
इस समय तुम मोहवश मेरे निर्देशानुसार कर्म करने से मना कर रहे हो । लेकिन हे कुन्तीपुत्र! तुम अपने ही स्वभाव से उत्पन्न कर्म द्वारा बाध्य होकर वही सब करोगे ।
५९

अध्याय १८ - श्लोक ६१

Chapter 18 - Verse 61
हे अर्जुन! परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं और भौतिक शक्ति से निर्मित यन्त्र में सवार की भाँति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा (भरमा) रहे हैं ।
६०

अध्याय १८ - श्लोक ६२

Chapter 18 - Verse 62
हे भारत! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ । उसकी कृपा से तुम परम शान्ति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे ।
६१

अध्याय १८ - श्लोक ६३

Chapter 18 - Verse 63
इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्यतर ज्ञान बतला दिया । इस पर पूरी तरह से मनन करो और तब जो चाहो सो करो ।
६२

अध्याय १८ - श्लोक ६४

Chapter 18 - Verse 64
चूँकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो, अतएव मैं तुम्हें अपना परम आदेश, जो सर्वाधिक गुह्यज्ञान है, बता रहा हूँ । इसे अपने हित के लिए सुनो ।
६३

अध्याय १८ - श्लोक ६५

Chapter 18 - Verse 65
सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो । इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे । मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे परम प्रिय मित्र हो ।
६४

अध्याय १८ - श्लोक ६६

Chapter 18 - Verse 66
समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ । मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा । डरो मत ।
६५

अध्याय १८ - श्लोक ६७

Chapter 18 - Verse 67
यह गुह्यज्ञान उनको कभी भी न बताया जाय जो न तो संयमी हैं, न एकनिष्ठ, न भक्ति में रत हैं, न ही उसे जो मुझसे द्वेष करता हो ।
६६

अध्याय १८ - श्लोक ६८

Chapter 18 - Verse 68
जो व्यक्ति भक्तों को यह परम रहस्य बताता है, वह शुद्धभक्ति को प्राप्त करेगा और अन्त में वह मेरे पास वापस आएगा ।
६७

अध्याय १८ - श्लोक ६९

Chapter 18 - Verse 69
इस संसार में उसकी अपेक्षा कोई अन्य सेवक न तो मुझे अधिक प्रिय है और न कभी होगा ।
६८

अध्याय १८ - श्लोक ७०

Chapter 18 - Verse 70
और मैं घोषित करता हूँ कि जो हमारे इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि से मेरी पूजा करता है ।
६९

अध्याय १८ - श्लोक ७१

Chapter 18 - Verse 71
और जो श्रद्धा समेत तथा द्वेषरहित होकर इसे सुनता है, वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है और उन शुभ लोकों को प्राप्त होता है, जहाँ पुण्यात्माएँ निवास करती हैं ।
७०

अध्याय १८ - श्लोक ७२

Chapter 18 - Verse 72
हे पृथापुत्र! हे धनञ्जय! क्या तुमने इसे (इस शास्त्र को) एकाग्र चित्त होकर सुना ? और क्या अब तुम्हारा अज्ञान तथा मोह दूर हो गया है ?
७१

अध्याय १८ - श्लोक ७३

Chapter 18 - Verse 73
अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण, हे अच्युत! अब मेरा मोह दूर हो गया । आपके अनुग्रह से मुझे मेरी स्मरण शक्ति वापस मिल गई । अब मैं संशयरहित तथा दृढ़ हूँ और आपके आदेशानुसार कर्म करने के लिए उद्यत हूँ ।
७२

अध्याय १८ - श्लोक ७४

Chapter 18 - Verse 74
संजय ने कहा - इस प्रकार मैंने कृष्ण तथा अर्जुन इन दोनों महापुरुषों की वार्ता सुनी । और यह सन्देश इतना अद्भुत है कि मेरे शरीर में रोमाञ्च हो रहा है ।
७३

अध्याय १८ - श्लोक ७५

Chapter 18 - Verse 75
व्यास की कृपा से मैंने ये परम गुह्य बातें साक्षात् योगेश्वर कृष्ण के मुख से अर्जुन के प्रति कही जाती हुई सुनीं ।
७४

अध्याय १८ - श्लोक ७६

Chapter 18 - Verse 76
हे राजन्! जब मैं कृष्ण तथा अर्जुन के मध्य हुई इस आश्चर्यजनक तथा पवित्र वार्ता का बारम्बार स्मरण करता हूँ, तो प्रति क्षण आह्लाद से गद्गद् हो उठता हूँ ।
७५

अध्याय १८ - श्लोक ७७

Chapter 18 - Verse 77
हे राजन्! भगवान् कृष्ण के अद्भुत रूप का स्मरण करते ही मैं अधिकाधिक आश्चर्यचकित होता हूँ और पुनःपुनः हर्षित होता हूँ ।
७६

अध्याय १८ - श्लोक ७८

Chapter 18 - Verse 78
जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ परम धनुर्धर अर्जुन है, वहीं ऐश्वर्य, विजय, अलौकिक शक्ति तथा नीति भी निश्चित रूप से रहती है । ऐसा मेरा मत है ।