भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥
bhogaiśvarya-prasaktānāṁ
tayāpahṛta-cetasām
vyavasāyātmikā buddhiḥ
samādhau na vidhīyate
जो लोग इन्द्रियभोग तथा भौतिक ऐश्वर्य के प्रति अत्यधिक आसक्त होने से ऐसी वस्तुओं से मोहग्रस्त हो जाते हैं, उनके मनों में भगवान् के प्रति भक्ति का दृढ़ निश्चय नहीं होता ।
अर्थ जानने हेतु शब्द दबाएँ
तात्पर्य पढ़ें
समाधि का अर्थ है “स्थिर मन” वैदिक शब्दकोश निरुक्ति के अनुसार – सम्यग् आधीयतेऽस्मिन्नात्मतत्त्वयाथात्म्यम् – जब मन आत्मा को समझने में स्थिर रहता है तो उसे समाधि कहते हैं । जो लोग इन्द्रियभोग में रुचि रखते हैं अथवा जो ऐसी क्षणिक वस्तुओं से मोहग्रस्त हैं उनके लिए समाधि कभी भी सम्भव नहीं है । माया के चक्कर में पड़कर वे न्यूनाधिक पतन को प्राप्त होते हैं ।