नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥
naiva tasya kṛtenārtho
nākṛteneha kaścana
na cāsya sarva-bhūteṣu
kaścid artha-vyapāśrayaḥ
स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के लिए न तो अपने नियत कर्मों को करने की आवश्यकता रह जाती है, न ऐसा कर्म न करने का कोई कारण ही रहता है । उसे किसी अन्य जीव पर निर्भर रहने की आवश्यकता भी नहीं रह जाती ।
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तात्पर्य पढ़ें
स्वरूपसिद्ध व्यक्ति को कृष्णभावनाभावित कर्म के अतिरिक्त कुछ भी करना नहीं होता । किन्तु यह कृष्णभावनामृत निष्क्रियता भी नहीं है, जैसा कि अगले श्लोकों में बताया जाएगा । कृष्णभावनाभावित व्यक्ति किसी की शरण ग्रहण नहीं करता - चाहे वह मनुष्य हो या देवता । कृष्णभावनामृत में वह जो भी करता है वही उसके कर्तव्य-सम्पादन के लिए पर्याप्त है ।