अध्याय ५ - श्लोक १२

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥

yuktaḥ karma-phalaṁ tyaktvā
śāntim āpnoti naiṣṭhikīm
ayuktaḥ kāma-kāreṇa
phale sakto nibadhyate


निश्चल भक्त शुद्ध शान्ति प्राप्त करता है क्योंकि वह समस्त कर्मफल मुझे अर्पित कर देता है, किन्तु जो व्यक्ति भगवान् से युक्त नहीं है और जो अपने श्रम का फलकामी है, वह बँध जाता है ।

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तात्पर्य पढ़ें
एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति तथा एक देहात्मबुद्धि वाले व्यक्ति में यह अन्तर है कि पहला तो कृष्ण के प्रति आसक्त रहता है जबकि दूसरा अपने कर्मों के फल के प्रति आसक्त रहता है । जो व्यक्ति कृष्ण के प्रति आसक्त रहकर उन्हीं के लिए कर्म करता है वह निश्चय ही मुक्त पुरुष है और उसे अपने कर्मफल की कोई चिन्ता नहीं होती । भागवत में किसी कर्म के फल की चिन्ता का कारण परम सत्य के ज्ञान के बिना द्वैतभाव में रहकर कर्म करना बताया गया है । कृष्ण श्रीभगवान् हैं । कृष्णभावनामृत में कोई द्वैत नहीं रहता । जो कुछ विद्यमान है वह कृष्ण की शक्ति का प्रतिफल है और कृष्ण सर्वमंगलमय हैं । अतः कृष्णभावनामृत में सम्पन्न सारे कार्य परम पद पर हैं । वे दिव्य होते हैं और उनका कोई भौतिक प्रभाव नहीं पड़ता । इस कारण कृष्णभावनामृत में जीव शान्ति से पूरित रहता है । किन्तु जो इन्द्रियतृप्ति के लिए लाभ के लोभ में फँसा रहता है, उसे शान्ति नहीं मिल सकती । यही कृष्णभावनामृत का रहस्य है - यह अनुभूति कि कृष्ण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, शान्ति तथा अभय का पद है ।