रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥

शब्दार्थ

रुद्राणाम् – समस्त रुद्रों में; शङकरः – शिवजी; – भी; अस्मि – हूँ; वित्त-ईशः – देवताओं का कोषाध्यक्ष; यक्ष-रक्षसाम् – यक्षों तथा राक्षसों में; वसूनाम् – वसुओं में; पावकः – अग्नि; – भी; अस्मि – हूँ; मेरुः – मेरु; शिखरिणाम् – समस्त पर्वतों में; अहम् – मैं हूँ ।

भावार्थ

मैं समस्त रुद्रों में शिव हूँ, यक्षों तथा राक्षसों में सम्पत्ति का देवता (कुबेर) हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ और समस्त पर्वतों में मेरु हूँ ।

तात्पर्य

ग्यारह रुद्रों में शंकर या शिव प्रमुख हैं । वे भगवान् के अवतार हैं, जिन पर ब्रह्माण्ड के तमोगुण का भार है । यक्षों तथा राक्षसों के नायक कुबेर हैं जो देवताओं के कोषाध्यक्ष तथा भगवान् के प्रतिनिधि हैं । मेरु पर्वत अपनी समृद्ध प्राकृत सम्पदा के लिए विख्यात है । पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।