श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥

शब्दार्थ

श्रीभगवान् उवाच - भगवान् ने कहा; कालः - काल; अस्मि - हूँ; लोक - लोकों का; क्षय-कृत - नाश करने वाला; प्रवृद्धः - महान; लोकान् - समस्त लोगों को; समाहर्तुम् - नष्ट करने वाला; प्रवृत्तः - लगा हुआ; ऋते - बिना; अपि - भी; त्वाम् - आपको; - कभी नहीं; भविष्यन्ति - होंगे; सर्वे - सभी; ये - जो; अवस्थिताः - स्थित; प्रति-अनीकेषु - विपक्ष में; योधाः - सैनिक ।

भावार्थ

भगवान् ने कहा - समस्त जगतों को विनष्ट करने वाला काल मैं हूँ और मैं यहाँ समस्त लोगों का विनाश करने के लिए आया हूँ । तुम्हारे (पाण्डवों के) सिवा दोनों पक्षों के सारे योद्धा मारे जाएँगे ।

तात्पर्य

यद्यपि अर्जुन जानता था कि कृष्ण उसके मित्र तथा भगवान् हैं, तो भी वह कृष्ण के विविध रूपों को देखकर चकित था । इसलिए उसने इस विनाशकारी शक्ति के उद्देश्य के बारे में पूछताछ की । वेदों में लिखा है कि परम सत्य हर वस्तु को, यहाँ तक कि ब्राह्मणों को भी, नष्ट कर देते हैं । कठोपनिषद् का (१.२.२५) वचन है –

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥

अन्ततः सारे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा अन्य सभी परमेश्वर द्वारा काल-कवलित होते हैं । परमेश्वर का यह रूप सबका भक्षण करने वाला है और यहाँ पर कृष्ण अपने को सर्वभक्षी काल के रूप में प्रस्तुत करते हैं । केवल कुछ पाण्डवों के अतिरिक्त युद्धभूमि में आये सभी लोग उनके द्वारा भक्षित होंगे ।

अर्जुन लड़ने के पक्ष में न था, वह युद्ध न करना श्रेयस्कर समझता था, क्योंकि तब किसी प्रकार की निराशा न होती । किन्तु भगवान् का उत्तर है कि यदि वह नहीं लड़ता, तो भी सारे लोग उनके ग्रास बनते, क्योंकि यही उनकी इच्छा है । यदि अर्जुन नहीं लड़ता, तो वे सब अन्य विधि से मरते । मृत्यु रोकी नहीं जा सकती, चाहे वह लड़े या नहीं । वस्तुतः वे पहले से मृत हैं । काल विनाश है और परमेश्वर की इच्छानुसार सारे संसार को विनष्ट होना है । यह प्रकृति का नियम है ।