त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८ ॥

शब्दार्थ

त्वम् – आप; आदि-देवः – आदि परमेश्वर; पुरुषः – पुरुष; पुराणः – प्राचीन, सनातन; त्वम् – आप; अस्य – इस; विश्वस्य – विश्व का; परम् – दिव्य; निधानम् – आश्रय; वैत्ता – जानने वाला; असि – हओ; वेद्यम् – जानने योग्य, ज्ञेय; – तथा; परम् – दिव्य; – और; धाम – वास, आश्रय; त्वया – आपके द्वारा; ततम् – व्याप्त; विश्वम् – विश्व; अनन्त-रूप – हे अनन्त रूप वाले ।

भावार्थ

आप आदि देव, सनातन पुरुष तथा इस दृश्यजगत के परम आश्रय हैं । आप सब कुछ जानने वाले हैं और आप ही वह सब कुछ हैं, जो जानने योग्य है । आप भौतिक गुणों से परे परम आश्रय हैं । हे अनन्त रूप! यह सम्पूर्ण दृश्यजगत आपसे व्याप्त है ।

तात्पर्य

प्रत्येक वस्तु भगवान् पर आश्रित है, अतः वे ही परम आश्रय हैं । निधानम् का अर्थ है - ब्रह्म तेज समेत सारी वस्तुएँ भगवान् कृष्ण पर आश्रित हैं । वे इस संसार में घटित होने वाली प्रत्येक घटना को जानने वाले हैं और यदि ज्ञान का कोई अन्त है, तो वे ही समस्त ज्ञान के अन्त हैं । अतः वे ज्ञाता हैं और ज्ञेय (वेद्यं) भी । वे जानने योग्य हैं, क्योंकि वे सर्वव्यापी हैं । वैकुण्ठलोक में कारण स्वरूप होने से वे दिव्य हैं । वे दिव्यलोक में भी प्रधान पुरुष हैं ।