श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥

शब्दार्थ

श्री-भगवान् उवाच – श्रीभगवान् ने कहा; अशोच्यान् – जो शोक के योग्य नहीं हैं; अन्वशोचः – शोक करते हो; त्वम् – तुम; प्रज्ञा-वादान् – पाण्डित्यपूर्ण बातें; – भी; भाषसे – कहते हो; गत – चले गये, रहित; असून् – प्राण; अगत – नहीं गये; असून् – प्राण; – भी; – कभी नहीं; अनुशोचन्ति – शोक करते हैं; पण्डिताः – विद्वान् लोग ।

भावार्थ

श्री भगवान् ने कहा - तुम पाण्डित्यपूर्ण वचन कहते हुए उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं । जो विद्वान होते हैं, वे न तो जीवित के लिए, न ही मृत के लिए शोक करते हैं ।

तात्पर्य

भगवान् ने तत्काल गुरु का पद सँभाला और अपने शिष्य को अप्रत्यक्षतः मूर्ख कह कर डाँटा । उन्होंने कहा, “तुम विद्वान् की तरह बातें करते हो, किन्तु तुम यह नहीं जानते कि जो विद्वान् होता है - अर्थात् जो यह जानता है कि शरीर तथा आत्मा क्या हैं - वह किसी भी अवस्था में शरीर के लिए, चाहे वह जीवित हो या मृत - शोक नहीं करता ।” अगले अध्यायों से यह स्पष्ट हो जायेगा कि ज्ञान का अर्थ पदार्थ तथा आत्मा एवं इन दोनों के नियामक को जानना है । अर्जुन का तर्क था कि राजनीति या समाजनीति की अपेक्षा धर्म को अधिक महत्त्व मिलना चाहिए, किन्तु उसे यह ज्ञात न था कि पदार्थ, आत्मा तथा परमेश्वर का ज्ञान धार्मिक सूत्रों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है । और चूँकि उसमें इस ज्ञान का अभाव था, अतः उसे विद्वान् नहीं बनना चाहिए था । और चूँकि वह अत्यधिक विद्वान् नहीं था इसलिए वह शोक के सर्वथा अयोग्य वस्तु के लिए शोक कर रहा था । यह शरीर जन्मता है और आज या कल इसका विनाश निश्चित है, अतः शरीर उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि आत्मा है । जो इस तथ्य को जानता है वही असली विद्वान् है और उसके लिए शोक का कोई कारण नहीं हो सकता ।