अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥

शब्दार्थ

अच्छेद्यः – न टूटने वाला; अयम् – यह आत्मा; अदाह्यः – न जलाया जा सकने वाला; अयम् – यह आत्मा; अक्लेद्यः – अघुलनशील; अशोष्यः – न सुखाया जा सकने वाला; एव – निश्चय ही; – तथा; नित्यः – शाश्वत; सर्व-गतः – सर्वव्यापी; स्थाणुः – अपरिवर्तनीय,अविकारी; अचलः – जड़; अयम् – यह आत्मा; सनातनः – सदैव एक सा ।

भावार्थ

यह आत्मा अखंडित तथा अघुलनशील है । इसे न तो जलाया जा सकता है, न ही सुखाया जा सकता है । यह शाश्वत, सर्वव्यापी, अविकारी, स्थिर तथा सदैव एक सा रहने वाला है ।

तात्पर्य

अणु-आत्मा के इतने सारे गुण यही सिद्ध करते हैं कि आत्मा पूर्ण आत्मा का अणु-अंश है और बिना किसी परिवर्तन के निरन्तर उसी तरह बना रहता है । इस प्रसंग में अद्वैतवाद को व्यवहृत करना कठिन है क्योंकि अणु-आत्मा कभी भी परम-आत्मा के साथ मिलकर एक नहीं हो सकता । भौतिक कल्मष से मुक्त होकर अणु-आत्मा भगवान् के तेज की किरणों की आध्यात्मिक स्फुलिंग बनकर रहना चाह सकता है, किन्तु बुद्धिमान जीव तो भगवान् की संगति करने के लिए वैकुण्ठलोक में प्रवेश करता है ।

सर्वगत शब्द महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कोई संशय नहीं है कि जीव भगवान् की समग्र सृष्टि में फैले हुए हैं । वे जल, थल, वायु, पृथ्वी के भीतर तथा अग्नि के भीतर भी रहते हैं । जो यह मानते हैं कि वे अग्नि में स्वाहा हो जाते हैं वह ठीक नहीं है क्योंकि यहाँ कहा गया है कि आत्मा को अग्नि द्वारा जलाया नहीं जा सकता । अतः इसमें सन्देह नहीं कि सूर्यलोक में भी उपयुक्त प्राणी निवास करते हैं । यदि सूर्यलोक निर्जन हो तो सर्वगत शब्द निरर्थक हो जाता है ।