यतो यतो निश्चलति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥

शब्दार्थ

यतः यतः – जहाँ जहाँ भी; निश्र्चलति – विचलित होता है; मनः – मन; चञ्चलम् – चलायमान; अस्थिरम् – अस्थिर; ततः ततः – वहाँ वहाँ से; नियम्य – वश में करके; एतत् – इस; आत्मनि – अपने; एव – निश्चय ही; वशम् – वश में; नयेत् – ले आए ।

भावार्थ

मन अपनी चंचलता तथा अस्थिरता के कारण जहाँ कहीं भी विचरण करता हो, मनुष्य को चाहिए कि उसे वहाँ से खींचे और अपने वश में लाए ।

तात्पर्य

मन स्वभाव से चंचल और अस्थिर है । किन्तु स्वरूपसिद्ध योगी को मन को वश में लाना होता है, उस पर मन का अधिकार नहीं होना चाहिए । जो मन को (तथा इन्द्रियों को भी) वश में रखता है, वह गोस्वामी या स्वामी कहलाता है और जो मन के वशीभूत होता है वह गोदास अर्थात् इन्द्रियों का सेवक कहलाता है । गोस्वामी इन्द्रियसुख के मानक से भिज्ञ होता है । दिव्य इन्द्रियसुख वह है जिसमें इन्द्रियाँ हृषीकेश अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी भगवान् कृष्ण की सेवा में लगी रहती हैं । शुद्ध इन्द्रियों के द्वारा कृष्ण की सेवा ही कृष्णचेतना या कृष्णभावनामृत कहलाती है । इन्द्रियों को पूर्णवश में लाने की यही विधि है । इससे भी बढ़कर बात यह है कि यह योगाभ्यास की परम सिद्धि भी है ।