जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥

शब्दार्थ

जित-आत्मनः – जिसने मन को जीत लिया है; प्रशान्तस्य – मन को वश में करके शान्ति प्राप्त करने वाले का; परम-आत्मा – परमात्मा; समाहितः – पूर्णरूप से प्राप्त; शीत – सर्दी; उष्ण – गर्मी में; सुख – सुख; दुःखेषु – तथा दुख में; तथा – भी; मान – सम्मान; अपमानयोः – तथा अपमान में ।

भावार्थ

जिसने मन को जीत लिया है, उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है, क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है । ऐसे पुरुष के लिए सुख-दुख, सर्दी-गर्मी एवं मान-अपमान एक से हैं ।

तात्पर्य

वस्तुतः प्रत्येक जीव उस भगवान् की आज्ञा का पालन करने के निमित्त आया है, जो जन-जन के हृदयों में परमात्मा-रूप में स्थित है । जब मन बहिरंगा माया द्वारा विपथ कर दिया जाता है तब मनुष्य भौतिक कार्यकलापों में उलझ जाता है । अतः ज्योंही मन किसी योगपद्धति द्वारा वश में आ जाता है त्योंही मनुष्य को लक्ष्य पर पहुँचा हुआ मान लिया जाना चाहिए । मनुष्य को भगवद्-आज्ञा का पालन करना चाहिए । जब मनुष्य का मन परा-प्रकृति में स्थिर हो जाता है तो जीवात्मा के समक्ष भगवद्-आज्ञा पालन करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता । मन को किसी न किसी उच्च आदेश को मानकर उसका पालन करना होता है । मन को वश में करने से स्वतः ही परमात्मा के आदेश का पालन होता है । चूँकि कृष्णभावनाभावित होते ही यह दिव्य स्थिति प्राप्त हो जाती है, अतः भगवद्भक्त संसार के द्वन्द्वों, यथा सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी आदि से अप्रभावित रहता है । यह अवस्था व्यावहारिक समाधि या परमात्मा में तल्लीनता है ।