बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥

शब्दार्थ

बलम् – शक्ति; बल-वताम् – बलवानों का; – तथा; अहम् – मैं हूँ; काम – विषयभोग; राग – तथा आसक्ति से; विवर्जितम् – रहित; धर्म-अविरुद्धः – जो धर्म के विरुद्ध नहीं है; भूतेषु – समस्त जीवों में; कामः – विषयी जीवन; अस्मि – हूँ; भरत-ऋषभ – हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ !

भावार्थ

मैं बलवानों का कामनाओं तथा इच्छा से रहित बल हूँ । हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन) ! मैं वह काम हूँ, जो धर्म के विरुद्ध नहीं है ।

तात्पर्य

बलवान पुरुष की शक्ति का उपयोग दुर्बलों की रक्षा के लिए होना चाहिए, व्यक्तिगत आक्रमण के लिए नहीं । इसी प्रकार धर्म-सम्मत मैथुन सन्तानोत्पति के लिए होना चाहिए, अन्य कार्यों के लिए नहीं । अतः माता-पिता का उत्तरदायित्व है कि वे अपनी सन्तान को कृष्णभावनाभावित बनाएँ ।