न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥

शब्दार्थ

– नहीं; माम् – मेरी; दुष्कृतिनः – दुष्ट; मूढाः – मूर्ख; प्रपद्यन्ते – शरण ग्रहण करते हैं; नर-अधमाः – मनुष्यों में अधम; मायया – माया के द्वारा; अपहृत – चुराये गये; ज्ञानाः – ज्ञान वाले; आसुरम् – आसुरी; भावम् – प्रकृति या स्वभाव को; आश्रिताः – स्वीकार किये हुए ।

भावार्थ

जो निपट मूर्ख हैं, जो मनुष्यों में अधम हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है तथा जो असुरों की नास्तिक प्रकृति को धारण करने वाले हैं, ऐसे दुष्ट मेरी शरण ग्रहण नहीं करते ।

तात्पर्य

भगवद्गीता में यह कहा गया है कि श्रीभगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करने से मनुष्य प्रकृति के कठोर नियमों को लाँघ सकता है । यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि तो फिर विद्वान् दार्शनिक, वैज्ञानिक, व्यापारी, शासक तथा जनता के नेता सर्वशक्तिमान भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण क्यों नहीं ग्रहण करते ? बड़े-बड़े जननेता विभिन्न विधियों से विभिन्न योजनाएँ बनाकर अत्यन्त धैर्यपूर्वक जन्म-जन्मान्तर तक प्रकृति के नियमों से मुक्ति की खोज करते हैं । किन्तु यदि वही मुक्ति भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करने मात्र से सम्भव हो तो ये बुद्धिमान तथा श्रमशील मनुष्य इस सरल विधि को क्यों नहीं अपनाते ?

गीता इसका उत्तर अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में देती है । समाज के वास्तविक विद्वान् नेता यथा ब्रह्मा, शिव, कपिल, कुमारगण, मनु, व्यास, देवल, असित, जनक, प्रह्लाद, बलि तथा उनके पश्चात् मध्वाचार्य, रामानुजाचार्य, श्रीचैतन्य तथा बहुत से अन्य श्रद्धावान दार्शनिक, राजनीतिज्ञ, शिक्षक, विज्ञानी आदि हैं जो सर्वशक्तिमान परमपुरुष के चरणों में शरण लेते हैं । किन्तु जो लोग वास्तविक दार्शनिक, विज्ञानी, शिक्षक, प्रशासक आदि नहीं हैं, किन्तु भौतिक लाभ के लिए ऐसा बनते हैं, वे परमेश्वर की योजना या पथ को स्वीकार नहीं करते । उन्हें ईश्वर का कोई ज्ञान नहीं होता; वे अपनी सांसारिक योजनाएँ बनाते हैं और संसार की समस्याओं को हल करने के लिए अपने व्यर्थ प्रयासों के द्वारा स्थिति को और जटिल बना लेते हैं । चूँकि भौतिक शक्ति इतनी बलवती है, इसलिए वह नास्तिकों की अवैध योजनाओं का प्रतिरोध करती है और योजना आयोगों के ज्ञान को ध्वस्त कर देती है ।

नास्तिक योजना निर्माताओं को यहाँ पर दुष्कृतिनः कहा गया है जिसका अर्थ है, दुष्टजन । कृती का अर्थ पुण्यात्मा होता है । नास्तिक योजना-निर्माता कभी-कभी अत्यन्त बुद्धिमान और प्रतिभाशाली भी होता है, क्योंकि किसी भी विराट योजना के लिए, चाहे वह अच्छी हो या बुरी, बुद्धि की आवश्यकता होती है । लेकिन नास्तिक की बुद्धि का प्रयोग परमेश्वर की योजना का विरोध करने में होता है, इसीलिए नास्तिक योजना निर्माता दुष्कृती कहलाता है, जिससे सूचित होता है कि उसकी बुद्धि तथा प्रयास उल्टी दिशा की ओर होते हैं ।

गीता में यह स्पष्ट कहा गया है कि भौतिक शक्ति परमेश्वर के पूर्ण निर्देशन में कार्य करती है । उसका कोई स्वतन्त्र प्रभुत्व नहीं है । जिस प्रकार छाया पदार्थ का अनुसरण करती है, उसी प्रकार यह शक्ति भी कार्य करती है । तो भी यह भौतिक शक्ति अत्यन्त प्रबल है और नास्तिक अपने अनीश्वरवादी स्वभाव के कारण यह नहीं जान सकता कि वह किस तरह कार्य करती है, न ही वह परमेश्वर की योजना को जान सकता है । मोह तथा रजो एवं तमो गुणों में रहकर उसकी सारी योजनाएँ उसी प्रकार ध्वस्त हो जाती हैं, जिस प्रकार भौतिक दृष्टि से विद्वान्, वैज्ञानिक, दार्शनिक, शासक तथा शिक्षक होते हुए भी हिरण्यकशिपु तथा रावण की सारी योजनाएँ ध्वस्त हो गई थीं । ये दुष्कृती या दुष्ट चार प्रकार के होते हैं जिनका वर्णन नीचे दिया जाता है –

(१) मूढ़ - वे जो कठिन श्रम करने वाले भारवाही पशुओं की भाँति निपट मूर्ख होते हैं । वे अपने श्रम का लाभ स्वयं उठाना चाहते हैं, अतः वे भगवान् को उसे अर्पित करना नहीं चाहते । भारवाही पशु का उपयुक्त उदाहरण गधा है । इस पशु से उसका स्वामी अत्यधिक कार्य लेता है । गधा यह नहीं जानता कि वह अहर्निश किसके लिए काम करता है । वह घास से पेट भर कर संतुष्ट रहता है, अपने स्वामी से मार खाने के भय से केवल कुछ घंटे सोता है और गधी से बार-बार लात खाने के भय के बावजूद भी अपनी कामतृप्ति पूरी करता है । कभी-कभी गधा कविता करता है और दर्शन बघारता है, किन्तु उसके रेंकने से लोगों की शान्ति भंग होती है । ऐसी ही दशा उन सकाम-कर्मियों की है जो यह नहीं जानते कि वे किसके लिए कर्म करते हैं । वे यह नहीं जानते कि कर्म यज्ञ के लिए है ।

ऐसे लोग जो अपने द्वारा उत्पन्न कर्मों के भार से दबे रहते हैं प्रायः यह कहते सुने जाते हैं कि उनके पास अवकाश कहाँ कि वे जीव की अमरता के विषय में सुनें । ऐसे मूढों के लिए नश्वर भौतिक लाभ ही जीवन का सब कुछ होता है भले ही वे अपने श्रम फल के एक अंश का ही उपभोग कर सकें । कभी-कभी वे लाभ के लिए रातदिन नहीं सोते, भले ही उनके आमाशय में व्रण हो जाय या अपच हो जाय, वे बिना खाये ही संतुष्ट रहते हैं, वे मायामय स्वामियों के लाभ हेतु अहर्निश काम में व्यस्त रहते हैं । अपने असली स्वामी से अनभिज्ञ रहकर ये मूर्ख कर्मी माया की सेवा में व्यर्थ ही अपना समय गँवाते हैं । दुर्भाग्य तो यह है कि वे कभी भी स्वामियों के परम स्वामी की शरण में नहीं जाते, न ही वे सही व्यक्ति से उसके विषय में सुनने में कोई समय लगाते हैं । जो सूकर विष्ठा खाता है वह चीनी तथा घी से बनी मिठाइयों की परवाह नहीं करता । उसी प्रकार मूर्ख कर्मी इस नश्वर जगत् की इन्द्रियों को सुख देने वाले समाचारों को निरन्तर सुनता रहता है, किन्तु संसार को गतिशील बनाने वाली शाश्वत जीवित शक्ति (प्राण) के विषय में सुनने में तनिक भी समय नहीं लगाता ।

(२) दूसरे प्रकार का दुष्कृती नराधम अर्थात् अधम व्यक्ति कहलाता है । नर का अर्थ है, मनुष्य और अधम का अर्थ है, सब से नीच । चौरासी लाख जीव योनियों में से चार लाख मानव योनियाँ हैं । इनमें से अनेक निम्न मानव योनियाँ हैं, जिनमें से अधिकांश असंस्कृत हैं । सभ्य मानव योनियाँ वे हैं जिनके पास सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक नियम हैं । जो मनुष्य सामाजिक तथा राजनीतिक दृष्टि से उन्नत हैं, किन्तु जिनका कोई धर्म नहीं होता वे नराधम माने जाते हैं । धर्म ईश्वरविहीन नहीं होता क्योंकि धर्म का प्रयोजन परम सत्य को तथा उसके साथ मनुष्य के सम्बन्ध को जानना है । गीता में भगवान् स्पष्टतः कहते हैं कि उनसे परे कोई भी नहीं और वे ही परम सत्य हैं । मनुष्य-जीवन का सुसंस्कृत रूप सर्वशक्तिमान परम सत्य श्रीभगवान् कृष्ण के साथ मनुष्य की विस्मृतभावना को जागृत करने के लिए मिला है । जो इस सुअवसर को हाथ से जाने देता है वही नराधम है । शास्त्रों से पता चलता है कि जब बालक माँ के गर्भ में अत्यन्त असहाय रहता है, तो वह अपने उद्धार के लिए प्रार्थना करता है और वचन देता है कि गर्भ से बाहर आते ही वह केवल भगवान् की पूजा करेगा । संकट के समय ईश्वर का स्मरण प्रत्येक जीव का स्वभाव है, क्योंकि वह ईश्वर के साथ सदा से सम्बन्धित रहता है । किन्तु उद्धार के बाद बालक जन्म-पीड़ा को और उसी के साथ अपने उद्धारक को भी भूल जाता है, क्योंकि वह माया के वशीभूत हो जाता है ।

यह तो बालकों के अभिभावकों का कर्तव्य है कि वे उनमें सुप्त दिव्य भावनामृत को जागृत करें । वर्णाश्रम पद्धति में मनुस्मृति के अनुसार ईशभावनामृत को जागृत करने के उद्देश्य से दस शुद्धि-संस्कारों का विधान है, जो धर्म का पथ-प्रदर्शन करते हैं । किन्तु अब विश्व के किसी भाग में किसी भी विधि का दृढ़तापूर्वक पालन नहीं होता और फलस्वरूप ९९.९% जनसंख्या नराधम है ।

जब सारी जनसंख्या नराधम हो जाती है तो स्वाभाविक है कि उनकी सारी तथाकथित शिक्षा भौतिक प्रकृति की सर्वसमर्थ शक्ति द्वारा व्यर्थ कर दी जाती है । गीता के अनुसार विद्वान् पुरुष वही है जो एक ब्राह्मण, कुत्ता, गाय, हाथी तथा चांडाल को समान दृष्टि से देखता है । असली भक्त की भी ऐसी ही दृष्टि होती है । गुरु रूप ईश्वर के अवतार श्री नित्यानन्द प्रभु ने दो भाइयों जगाई तथा माधाई नामक विशिष्ट नराधमों का उद्धार किया और यह दिखला दिया कि किस प्रकार शुद्ध भक्त नराधमों पर दया करता है । अतः जो नराधम भगवान् द्वारा बहिष्कृत किया जाता है, वह केवल भक्त की अनुकम्पा से पुनः अपना आध्यात्मिक भावनामृत प्राप्त कर सकता है ।

श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भागवत-धर्म का प्रवर्तन करते हुए संस्तुति की है कि लोग विनीत भाव से भगवान् के सन्देश को सुनें । इस सन्देश का सार भगवद्गीता है । विनीत भाव से श्रवण करने मात्र से अधम से अधम मनुष्यों का उद्धार हो सकता है, किन्तु दुर्भाग्यवश वे इस सन्देश को सुनना तक नहीं चाहते - परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करना तो दूर रहा । ये नराधम मनुष्य के प्रधान कर्तव्य की डटकर उपेक्षा करते हैं ।

(३) दुष्कृतियों की तीसरी श्रेणी माययापहृतज्ञानाः की है अर्थात् ऐसे व्यक्तियों की जिनका प्रकाण्ड ज्ञान माया के प्रभाव से शून्य हो चुका है । ये अधिकांशतः बुद्धिमान व्यक्ति होते हैं - यथा महान दार्शनिक, कवि, साहित्यकार, वैज्ञानिक आदि, किन्तु माया इन्हें भ्रान्त कर देती है, जिसके कारण ये परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं ।

इस समय माययापहृतज्ञानाः की बहुत बड़ी संख्या है, यहाँ तक कि वे भगवद्गीता के विद्वानों के मध्य भी हैं । गीता में अत्यन्त सीधी सरल भाषा में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ही भगवान् हैं । न तो कोई उनके तुल्य है, न ही उनसे बड़ा । वे समस्त मनुष्यों के आदि पिता ब्रह्मा के भी पिता बताये गये हैं । वास्तव में वे ब्रह्मा के ही नहीं, अपितु समस्त जीवयोनियों के भी पिता हैं । वे निराकार ब्रह्म तथा परमात्मा के मूल हैं और जीवात्मा में स्थित परमात्मा उनका अंश है । वे सबके उत्स हैं और सबों को सलाह दी जाती है कि उनके चरणकमलों के शरणागत बनें । इन सब कथनों के बावजूद ये माययापहृतज्ञानाः भगवान् का उपहास करते हैं और उन्हें एक सामान्य मनुष्य मानते हैं । वे यह नहीं जानते कि भाग्यशाली मानव जीवन श्रीभगवान् के दिव्य शाश्वत स्वरूप के अनुरूप ही रचा गया है ।

गीता की ऐसी सारी अवैध व्याख्याएँ जो माययापहृतज्ञानाः वर्ग के लोगों द्वारा की गई हैं और परम्परा पद्धति से हटकर हैं, आध्यात्मिक जानकारी के पथ में रोड़े का कार्य करती हैं । मायाग्रस्त व्याख्याकार न तो स्वयं भगवान् कृष्ण के चरणों की शरण में जाते हैं और न अन्यों को इस सिद्धान्त का पालन करने के लिए शिक्षा देते हैं ।

(४) दुष्कृतियों की चौथी श्रेणी आसुरं भावमाश्रिताः अर्थात् आसुरी सिद्धान्त वालों की है । यह श्रेणी खुले रूप से नास्तिक होती है । इनमें से कुछ तर्क करते हैं कि परमेश्वर कभी भी इस संसार में अवतरित नहीं हो सकता, किन्तु वे इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं बता पाते कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता । कुछ ऐसे हैं जो परमेश्वर को निर्विशेष रूप के अधीन मानते हैं, यद्यपि गीता में इसका उल्टा बताया गया है । नास्तिक श्रीभगवान् के द्वेषवश अपनी बुद्धि से कल्पित अनेक अवैध अवतारों को प्रस्तुत करते हैं । ऐसे लोग जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य भगवान् को नकारना है, श्रीकृष्ण के चरणकमलों के कभी शरणागत नहीं हो सकते ।

दक्षिण भारत के श्रीयामुनाचार्य अल्बन्दरु ने कहा है “हे प्रभु! आप उन लोगों द्वारा नहीं जाने जाते जो नास्तिक सिद्धान्तों में लगे हैं, भले ही आप विलक्षण गुण, रूप तथा लीला से युक्त हैं, सभी शास्त्रों ने आपका विशुद्ध सत्त्वमय विग्रह प्रमाणित किया है तथा दैवी गुणसम्पन्न दिव्यज्ञान के आचार्य भी आपको मानते हैं ।”

अतएव (१) मूढ़ (२) नराधम (३) माययापहृतज्ञानी अर्थात् भ्रमित मनोधर्मी, तथा (४) नास्तिक - ये चार प्रकार के दुष्कृती कभी भी भगवान् के चरणकमलों की शरण में नहीं जाते, भले ही सारे शास्त्र तथा आचार्य ऐसा उपदेश क्यों न देते रहें ।