श्री दुर्गा चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥
सुख प्रदान करने वाली हे दुर्गा मां, मेरा नमस्कार स्वीकार करें और मेरे सभी दुखों को हर लें ।
निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूं लोक फ़ैली उजियारी ॥
तिहूं लोक फ़ैली उजियारी ॥
मां आपकी ज्योति का प्रकाश अनंत है और इस प्रकाश से पृथ्वी, आकाश और पाताल तीनों ही लोकों में उजाला छाया हुआ है ।
शशी ललाट मुख महा विशाला ।
नेत्र लाल भृकुटी विकराला ॥
नेत्र लाल भृकुटी विकराला ॥
हे माता, आपका मुख इतना विशाल है और चंद्रमा के समान चमकदार है, वहीं आपकी आंखें लाल और भौं बहुत ही विकराल हैं ।
रुप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥
दरश करत जन अति सुख पावे ॥
हे मां दुर्गा आपका स्वरूप बहुत ही सुंदर है, जिसे बार-बार देखते ही रहने का मन करता है । आपके मुख के दर्शन पाकर भक्त जनों को परम सुख की प्राप्ति होती है ।
तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
संसार में जितनी भी शक्तियां हैं, वह सभी आप में समाहित हैं । इस जगत को चलाने वाली और अपने बच्चों का पालन करने वाली, हे मां दुर्गा! आप ही हमें अन्न और धन प्रदान करती हैं ।
अन्न्पूर्णा हूई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
हे देवी! आप ही अन्नपूर्णा माता हैं, इस जगत की पालन करता भी आप ही हैं । इस जगत में सबसे खूबसूरत छवि किसी की है, तो वह आपकी ही है ।
प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥
जब विश्व में घोर अपराध बढ़ जाता है, तो आप ही प्रलय लाती हैं । महादेव भगवान शिव की प्रिय गौरी यानि पार्वती भी आप ही हैं ।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावे ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥
भगवान शिव सहित ब्रह्मा, विष्णु और सभी योगी आपका गुणगान और ध्यान करते हैं ।
रुप सरस्वती का तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥
आप ही माता सरस्वती हैं, आपने ही अपनी शक्ति से सभी ऋषि-मुनियों को सद्बुद्धि दी है और उनका उद्धाधर किया है ।
धरा रुप नरसिंह को अम्बा ।
प्रकट भई फ़ाड़ कर खम्बा ॥
प्रकट भई फ़ाड़ कर खम्बा ॥
अपने ही श्री नरसिंह का रूप धारण किया था और खंबा फाड़ कर आप प्रकट हो गई थीं ।
रक्षा कर प्रहलाद बचायो ।
हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥
हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥
श्री हरि भक्त प्रहलाद को उसके राक्षस पिता हिरण्यकश्यप से बचाया ।
लक्ष्मी रुप धरो जग माहीं ।
श्री नारायण अंग समाहीं ॥
श्री नारायण अंग समाहीं ॥
लक्ष्मी का रूप धारण करके आप ही श्री हरि विष्णु के साथ उनकी संगनी के रूप में मौजूद हैं ।
क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।
दया सिन्धु दीजै मन आसा ॥
दया सिन्धु दीजै मन आसा ॥
क्षीरसागर में भगवान विष्णु के साथ दया की मूर्ति के रूप में आप ही विराजमान हैं और अपने सभी भक्तों पर वहां से कृपा बरसाती रहती हैं ।
हिंगलाज में तुम्ही भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥
महिमा अमित न जात बखानी ॥
हिंगलाज की भी देवी आप ही हैं और आपकी महिमा अनंत है, जिसका बखान तीनो लोक में होता है ।
मातंगी धूमावती माता ।
भूवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥
भूवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥
हे देवी! आपके एक नहीं अनेक स्वरूप हैं और आप ही मातंगी देवी, धूमावती, भुवनेश्वरी और बगलामुखी माता हैं। आपके यह सभी रूप सुख प्रदान करते हैं ।
श्री भैरव तारा जग तारणि ।
छिन्नभाल भव दुःख निवारिणी ॥
छिन्नभाल भव दुःख निवारिणी ॥
आप भैरव और तारादेवी के रूप में इस जगत का उद्धार कर रही हैं, वहीं छिन्नमस्तिका देवी के रूप में आप सभी भक्तों के दुख और कष्टों को हर लेती हैं ।
केहरि वाहन सोहे भवानी ।
लांगुर बीर चलत अगवानी ॥
लांगुर बीर चलत अगवानी ॥
हे माता! आपकी सवारी सिंह है और स्वयं हनुमान जी (हनुमान जी की पूजा ऐसे करें) जैसे वीर आपकी सेवा में हर वक्त मौजूद रहते हैं ।
कर में खप्पर खड्ग विराजै ।
जाको देख काल डर भाजै ॥
जाको देख काल डर भाजै ॥
देवी दुर्गा के हाथों में जब काल रूपी खप्पर होता है, तो उसे देख कर स्वयं काल भी भयभीत हो जाता है ।
सोहे अस्त्र और त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥
हाथों में त्रिशूल जैसे शक्तिशाली शस्त्र को धारण करने वाली मां दुर्गा को देख कर शत्रुओं का हृदय तक कांप उठता है ।
नगर कोटि मे तुम्ही विराजत ।
तिहूँ लोक में डंका बाजत ॥
तिहूँ लोक में डंका बाजत ॥
हे देवी! नगरकोट में तुम्हीं रहती हो और तीनों लोक में तुम्हारे नाम का ही डंका बजता है ।
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
रक्त बीज शंखन संहारे ॥
रक्त बीज शंखन संहारे ॥
हे माता! आपने शुम्भ-निशुम्भ जैसे राक्षसों का संहार किया है और रक्तबीज जैसे वरदान प्राप्त राक्षस का भी नाश किया है, जिसके रक्त की एक बूंद गिरने पर सैकड़ों राक्षस पैदा हो जाते थे । इतना ही नहीं, शंख नाम के राक्षस को भी आपने ही मारा है ।
महिशासुर नृप अति अभिमानी ।
जेही अध भार मही अकुलानी ॥
जेही अध भार मही अकुलानी ॥
रुप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥
जब दैत्यराज महिषासुर के पापों का घड़ा भर गया, तब उसके अभिमान को चूर-चूर करने और व्याकुल धरती के बोझ को हल्का करने के लिए, आप काली का विकराल रूप धारण कर आ थीं और महिषासुर का उसकी सेना सहित सर्वनाश कर दिया था ।
परी गाढ़ संतन पर जब जब ।
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥
हे माता! जब-जब आपके भक्तों पर मुसीबत आई है, तब-तब आप ही उनकी सहायता करने के लिए आई हैं ।
अमर पुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब रहें अशोका ॥
तब महिमा सब रहें अशोका ॥
हे माता! जब तक देवों की अमरपुरी और तीनों लोकों का अस्तित्व है, तब तक आपके भक्तों को कोई शोक नहीं घेर सकता है ।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुमहें सदा पूजें नर नारी ॥
तुमहें सदा पूजें नर नारी ॥
ज्वाला की ज्योति में भी तुम ही समाहित हो माता। तब ही तो ज्वालाजी में अनंत काल से ज्योति जलती चली आ रही है । इसलिए सभी नर-नारी आपकी पूजा करते हैं ।
प्रेम भक्ति से जो यश गावें ।
दुःख दरिद्र निकट नही आवे ॥
दुःख दरिद्र निकट नही आवे ॥
आपके गुणगान, जो भी भक्त प्रेम और श्रद्धा से गाता है, दुख एवं दरिद्रता उसके नजदीक नहीं आती है ।
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई ॥
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई ॥
जो प्राणी मन से आपका ध्यान करता है, उसे जन्म-मरण के चक्र से आप निश्चित ही मुक्ति दे देती हैं ।
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥
आपकी शक्ति के बिना तो योग भी नहीं संभव है, इसलिए योगी, ऋषि-मुनी और साधु-संत भी आपका ही नाम पुकारते हैं ।
शंकर आचारज तप कीनो ।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥
शंकराचार्य जी ने आचारज नाम का तप किया और इससे काम, क्रोध, मद, लोभ आदि सभी पर उनको जीत हासिल हो गई ।
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहू काल नहिं सुमिरो तुमको ॥
काहू काल नहिं सुमिरो तुमको ॥
शक्ति रुप को मरम न पायो ।
शक्ति गई तब मन पछतायो ॥
शक्ति गई तब मन पछतायो ॥
शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥
उन्होंने हर दिन भगवान शंकर का ध्यान किया मगर आपको स्मरण नहीं किया । वे यह बात समझ ही नहीं पाए कि आप ही आदि शक्ति हैं । जब उनकी शक्तियां छिन गई, तब मन ही मन उन्हें पछतावा हुआ और जब उन्हें आपकी शक्तियों का अहसास हुआ, तब वह आपकी शरण में आए और आपके भक्त बन बैठे ।
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥
मोको मात कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो ॥
तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो ॥
हे देवी! आपने जिस तरह से शंकराचार्य जी से प्रसन्न होकर उनकी सभी शक्तियां उन्हें वापस लौटा दी थीं, वैसे ही मुझे भी ढेरों कष्टों ने घेर रखा है । इन कष्टों को केवल आप ही दूर कर सकती हैं । (दुर्गा चालीसा का पाठ करने के लाभ)
आशा तृश्णा निपट सतावे ।
मोह मदादिक सब विनशावै ॥
मोह मदादिक सब विनशावै ॥
शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरौं एकचित तुम्हें भवानी ॥
सुमिरौं एकचित तुम्हें भवानी ॥
हे माता! नई-नई आशाएं और ज्यादा से ज्यादा मिलने की प्यास मुझे सदैव सताती रहती है । मेरे अंदर क्रोध,मोह, अहंकार, काम और ईर्ष्या जैसे भाव भी हैं, जो हर घड़ी मुझे परेशान करते हैं । यह सभी मेरे शत्रु हैं । हे देवी! मैं आपका ध्यान करता हूं और आपसे विनती करता हूं कि आप इन सभी शत्रुओं का नाश कर दें ।
करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ॥
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ॥
जब लगि जियौ दया फ़ल पाऊं ।
तुम्हरे यश मैं सदा सुनाऊं ॥
तुम्हरे यश मैं सदा सुनाऊं ॥
हे दया की देवी! मुझ पर अपनी कृपा बरसाओ और मुझे ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करके मेरे जीवन को सफल बना दो । हे माता! मैं अपनी आखिरी सांस तक आपके ही गुणगान गाऊंगा, बस आप मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें ।
दुर्गा चालीसा जो नित गावै ।
सब सुख भोग परम पद पावै ॥
सब सुख भोग परम पद पावै ॥
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥
जो व्यक्ति नियमित दुर्गा चालीसा का पाठ करता है, उसे हर सुख की प्राप्ति होती है और परम आनंद मिलता है । इसलिए हे माता रानी! हमें अपनी शरण में ले लीजिए और हम पर अपनी कृपा बनाए रखिए ।