तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥ १ ॥
īśā vāsyam idaṃ sarvaṃ yat kiñca jagatyāṃ jagat .
tena tyaktena bhuñjīthā mā gṛdhaḥ kasya sviddhanam .. 1 ..
जो ईशन (शासन) करे उसे ईट् कहते हैं, उसका तृतीयान्त रूप ‘ईशा’ है । सबका ईशन करनेवाला परमेश्वर परमात्मा है । वही सब जीवों का आत्मा होकर अन्तर्यामीरूप से सबका ईशन करता है । उस अपने स्वरूपभूत आत्मा ईश से सब वास्य—आच्छादन करनेयोग्य है ।
क्या [आच्छादन करनेयोग्य है]? यह सब जो कुछ जगती अर्थात् पृथ्वी में जगत् (स्थावर-जंगम प्राणिवर्ग) है वह सब अपने आत्मा ईश्वर से— अन्तर्यामीरूप से यह सब कुछ मैं ही हूँ ।—ऐसा जानकर अपने परमार्थसत्यस्वरूप परमात्मा से यह सम्पूर्ण मिथ्याभूत चराचर आच्छादन करनेयोग्य है ।
जिस प्रकार चन्दन और अगरु आदि की, जल आदि के सम्बन्ध से गीलेपन आदि के कारण उत्पन्न हुई औपाधिक दुर्गन्धि उन (चन्दनादि)-के स्वरूप को घिसने से उनके पारमार्थिक गन्ध से आच्छादित हो जाती है, उसी प्रकार अपने आत्मा में आरोपित स्वाभाविक कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि लक्षणोंवाला द्वैतरूप जगत् जगती में यानी पृथ्वी में— ‘जगत्याम्’ यह शब्द [स्थावर-जंगम सभी का] उपलक्षण करानेवाला होने से— इस परमार्थसत्यस्वरूप आत्मा की भावना से नाम-रूप और कर्ममय सारा ही विकारजात परित्यक्त हो जाता है ।
इस प्रकार जो, ईश्वर ही चराचर जगत् का आत्मा है—ऐसी भावना से युक्त है, उसका पुत्रादि तीनों एषणाओं के त्याग में ही अधिकार है—कर्म में नहीं । उसके त्यक्त अर्थात् त्याग से [आत्मा का पालन कर] । त्यागा हुआ अथवा मरा हुआ पुत्र या सेवक, अपने सम्बन्ध का अभाव हो जाने के कारण अपना पालन नहीं करता; अतः त्याग से—यही इस श्रुति का अर्थ है—भोग यानी पालन कर ।
इस प्रकार एषणाओं से रहित होकर तू गर्द्ध अर्थात् धनविषयक आकांक्षा न कर । किसी के धन की अर्थात् अपने या पराये किसी के भी धन की इच्छा न कर । यहाँ ‘स्वित्’ यह अर्थरहित निपात है ।
अथवा आकांक्षा न कर, क्योंकि धन भला किसका है? इस प्रकार इसका आक्षेपसूचक अर्थ भी हो सकता है अर्थात् धन किसी का भी नहीं है जो उसकी इच्छा की जाय । यह सब आत्मा ही है—इस प्रकार ईश्वरभावना से यह सभी परित्यक्त हो जाता है । अतः यह सब आत्मा से उत्पन्न हुआ तथा सब कुछ आत्मरूप ही होने के कारण मिथ्यापदार्थविषयक आकांक्षा न कर—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ईशा ईष्ट इतीट् तेनेशा । ईशिता परमेश्वरः परमात्मा सर्वस्य । स हि सर्वमीष्टे सर्वजन्तूनामात्मा सन्प्रत्यगात्मतया तेन स्वेन रूपेणात्मनेशा वास्यमाच्छादनीयम् ।
किम्? इदं सर्वं यत्किञ्च यत्किञ्चिज्जगत्यां पृथिव्यां जगत्तत्सर्वं स्वेनात्मना ईशेन प्रत्यगात्मतयाहमेवेदं सर्वमिति परमार्थसत्यरूपेणामृतमिदं सर्वं चराचरमाच्छादनीयं स्वेन परमात्मना ।
यथा चन्दनागर्वादेरुदकादिसम्बन्धजक्लेदादिजमौपाधिकं दौर्गन्ध्यं तत्स्वरूपनिघर्षणेन आच्छाद्यते स्वेन पारमार्थिकेन गन्धेन । तद्वदेव हि स्वात्मनि अध्यस्तं स्वाभाविकं कर्तृत्वभोक्तृत्वादिलक्षणं जगद्द्वैतरूपं जगत्यां पृथिव्याम्, जगत्यामिति उपलक्षणार्थत्वात्सर्वमेव नामरूपकर्माख्यं विकारजातं परमार्थसत्यात्मभावनया त्यक्तं स्यात् ।
एवमीश्वरात्मभावनया युक्तस्य आत्मनिष्ठस्य पुत्राद्येषणात्रयसंन्यास त्याग एवं एवाधिकारो न अधिकारः कर्मसु । तेन त्यक्तेन त्यागेनेत्यर्थः । न हि त्यक्तो मृतः पुत्रो वा भृत्यो वा आत्मसम्बन्धिताया अभावाद् आत्मानं पालयति अतस्त्यागेन इत्ययमेव वेदार्थः—भुञ्जीथाः पालयेथाः ।
एवं त्यक्तैषणस्त्वं मा गृधः, गृधिमाकाङ्क्षा मा कार्षीर्धनविषयाम् । कस्यस्विद्धनं कस्यचित्परस्य स्वस्य वा धनं मा काङ्क्षीरित्यर्थः । स्विदित्यनर्थको निपातः ।
अथवा मा गृधः । कस्मात्? कस्यस्विद्धनमित्याक्षेपार्थो न कस्यचिद्धनमस्ति यद्गृद्ध्येत । आत्मैवेदं सर्वमितीश्वरभावनया सर्वं त्यक्तमत आत्मन एवेदं सर्वमात्मैव च सर्वमतो मिथ्याविषयां गृधिं मा कार्षीरित्यर्थः ॥ १ ॥