मन्त्र 10

अन्यद् एवाहुर् विद्ययान् यद् आहुर् अविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस् तद् विचचक्षिरे ॥ १० ॥

anyad evāhur vidyayān yad āhur avidyayā .
iti śuśruma dhīrāṇāṃ ye nas tad vicacakṣire .. 10 ..


विद्या (देवताज्ञान)-से और ही फल बतलाया गया है तथा अविद्या (कर्म)-से और ही फल बतलाया है । ऐसा हमने बुद्धिमान् पुरुषों से सुना है, जिन्होंने हमारे प्रति उसकी व्यवस्था की थी ॥ १० ॥
“विद्या से देवलोक प्राप्त होता है” “विद्या से उसपर आरूढ़ होते हैं” ऐसी श्रुतियों के अनुसार वेदवेत्तालोग कहते हैं कि विद्या से और ही फल मिलता है । तथा “कर्म से पितृलोक मिलता है” इस श्रुति के अनुसार, अविद्या यानी कर्म से और ही फल होता है—ऐसा उनका कथन है । ऐसे हमने धीर अर्थात् बुद्धिमानों के वचन सुने हैं, जिन आचार्यों ने हमसे उस कर्म तथा ज्ञान का विख्यान किया था अर्थात् उनकी व्याख्या की थी । तात्पर्य यह है कि यह उनका परम्परागत आगम है ॥ १० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अन्यत्पृथगेव विद्यया क्रियते फलमित्याहुर्वदन्ति “विद्यया देवलोकः” (बृ० उ० १ । ५ । १६) “विद्यया तदारोहन्ति” इति श्रुतेः । अन्यदाहुरविद्यया कर्मणा क्रियते “कर्मणा पितृलोकः” (बृ० उ० १ । ५ । १६) इति श्रुतेः । इत्येवं शुश्रुम श्रुतवन्तो वयं धीराणां धीमतां वचनम् । ये आचार्या नोऽस्मभ्यं तत्कर्म च ज्ञानं च विचचक्षिरे व्याख्यातवन्तस्तेषामयमागमः पारम्पर्यागत इत्यर्थः ॥ १० ॥