मन्त्र 11

विद्यां चाविद्यां च यस् तद् वेदोभयं सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतम् अश्नुते ॥ ११ ॥

vidyāṃ cāvidyāṃ ca yas tad vedobhayaṃ saha .
avidyayā mṛtyuṃ tīrtvā vidyayāmṛtam aśnute .. 11 ..


जो विद्या और अविद्या—इन दोनों को ही एक साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार करके विद्या से अमरत्व प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

क्योंकि ऐसा है इसलिये विद्या और अविद्या अर्थात् देवताज्ञान और कर्म—इन दोनों को जो एक साथ एक ही पुरुष से अनुष्ठान किये जानेयोग्य जानता है, इस प्रकार समुच्चय करनेवाले को ही एक पुरुषार्थ का सम्बन्ध क्रमशः होता है—यही अब कहा जाता है ।

अविद्या अर्थात् अग्निहोत्रादि कर्म से मृत्यु यानी ‘मृत्यु’ शब्दवाच्य स्वाभाविक (व्यावहारिक) कर्म और ज्ञान—इन दोनों को तरकर—पार करके विद्या अर्थात् देवताज्ञान से अमृत यानी देवतात्मभाव को प्राप्त हो जाता है । देवत्वभाव को जो प्राप्त होना है वही अमृत कहा जाता है ॥ ११ ॥

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यत एवमतो विद्यां चाविद्यां च देवताज्ञानं कर्म चेत्यर्थः । यस्तदेतदुभयं सहैकेन पुरुषेण अनुष्ठेयं वेद तस्यैवं समुच्चयकारिण एव एकपुरुषार्थसम्बन्धः क्रमेण स्यादित्युच्यते ।

अविद्यया कर्मणा अग्निहोत्रादिना मृत्युं स्वाभाविकं कर्म ज्ञानं च मृत्युशब्दवाच्यमुभयं तीर्त्वा अतिक्रम्य विद्यया देवताज्ञानेनामृतं देवतात्मभावमश्नुते प्राप्नोति । तद्ध्यमृतमुच्यते यद्देवतात्मगमनम् ॥ ११ ॥


व्यक्त और अव्यक्त उपासना का समुच्चय

अब व्यक्त और अव्यक्त उपासनाओं का समुच्चय करने की इच्छा से प्रत्येक की निन्दा की जाती है ।
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अधुना व्याकृताव्याकृतोपासनयोः समुच्चिचीषया प्रत्येकं निन्दोच्यते ।