अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिम् उपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ॥ १२ ॥
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ॥ १२ ॥
andhaṃ tamaḥ praviśanti ye’sambhūtim upāsate .
tato bhūya iva te tamo ya u sambhūtyāṃ ratāḥ .. 12 ..
जो असम्भूति (अव्यक्त प्रकृति)-की उपासना करते हैं, वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं और जो सम्भूति (कार्यब्रह्म)-में रत हैं, वे मानो उनसे भी अधिक अन्धकार में प्रवेश करते हैं ॥ १२ ॥
जो असम्भूति की उपासना करते हैं; वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं । सम्भवन (उत्पन्न होने)-का नाम सम्भूति है । वह जिस कार्य का धर्म है, उसे ‘सम्भूति’ कहते हैं । उससे अन्य असम्भूति—प्रकृति—कारण अथवा अव्याकृत नाम की अविद्या है । उस असम्भूति यानी अव्याकृत नामवाली प्रकृति—कारण अर्थात् अज्ञानात्मिका अविद्या की जो कि कामना और कर्म की बीज है, जो लोग उपासना करते हैं, वे उसके अनुरूप ही अज्ञानरूप घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं तथा जो सम्भूति यानी हिरण्यगर्भ नामक कार्यब्रह्म में रत हैं, वे तो उससे भी गहरे—मानो अधिकतर अन्धकार में प्रवेश करते हैं ॥ १२ ॥
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अन्धं तमः प्रविशन्ति ये असम्भूतिं सम्भवनं सम्भूतिः सा यस्य कार्यस्य सा सम्भूतिः, तस्या अन्या असम्भूतिः प्रकृतिः कारणमविद्या अव्याकृताख्या तामसम्भूतिमव्याकृताख्यां प्रकृतिं कारणमविद्यां कामकर्मबीजभूतामदर्शनात्मिकामुपासते ये ते तदनुरूपमेवान्धं तमोऽदर्शनात्मकं प्रविशन्ति । ततस्तस्मादपि भूयो बहुतरमिव तमः प्रविशन्ति य उ सम्भूत्यां कार्यब्रह्मणि हिरण्यगर्भाख्ये रताः ॥ १२ ॥
व्यक्त और अव्यक्त उपासना के फल
अब उन दोनों उपासनाओं के समुच्चय का कारणरूप जो उन दोनों के फलों का भेद है उसका वर्णन किया जाता है—
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अधुनोभयोरुपासनयोः समुच्चयकारणमवयवफलभेदमाह—