मन्त्र 13

अन्यद् एवाहुः संभवाद् अन्यद् आहुर् असंभवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस् तद् विचचक्षिरे ॥ १३ ॥

anyad evāhuḥ saṃbhavād anyad āhur asaṃbhavāt .
iti śuśruma dhīrāṇāṃ ye nas tad vicacakṣire .. 13 ..


कार्यब्रह्म की उपासना से और ही फल बतलाया गया है; तथा अव्यक्तोपासना से और ही फल बतलाया है । ऐसा हमने बुद्धिमानों से सुना है, जिन्होंने हमारे प्रति उसकी व्याख्या की थी ॥ १३ ॥
सम्भूति अर्थात् कार्यब्रह्म की उपासना से प्राप्त होनेवाला अणिमादि ऐश्वर्यरूप और ही फल बतलाया अर्थात् बखान किया है । तथा असम्भूति यानी अव्याकृत से अर्थात् अव्याकृत प्रकृति की उपासना से और ही फल बतलाया है, जिसे पहले ‘अन्धं तमः प्रविशन्ति’ आदि वाक्य से कह चुके हैं तथा पौराणिक लोग जिसे प्रकृतिलय कहते हैं—ऐसा हमने धीरों (बुद्धिमानों)-का कथन सुना है, जिन्होंने हमसे उनका वर्णन किया था अर्थात् व्यक्त और अव्यक्त उपासनाओं के फल का व्याख्यान किया था ॥ १३ ॥
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अन्यदेव पृथगेवाहुः फलं सम्भवात्सम्भूतेः कार्यब्रह्मोपासनादणिमाद्यैश्वर्यलक्षणं व्याख्यातवन्त इत्यर्थः । तथा चान्यदाहुरसम्भवादसम्भूतेरव्याकृताद् अव्याकृतोपासनात् । यदुक्तमन्धं तमः प्रविशन्तीति प्रकृतिलय इति च पौराणिकैरुच्यत इत्येवं शुश्रुम धीराणां वचनं ये नस्तद्विचचक्षिरे व्याकृताव्याकृतोपासनफलं व्याख्यातवन्त इत्यर्थः ॥ १३ ॥

क्योंकि ऐसा है, इसलिये सम्भूति और असम्भूति की उपासनाओं का समुच्चय उचित ही है । इसके सिवा एक पुरुषार्थमूलक होने से भी उनका समुच्चय होना ठीक है—यही आगे कहते हैं—
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यत एवमतः समुच्चयः सम्भूत्यसम्भूत्युपासनयोर्युक्त एवैकपुरुषार्थत्वाच्चेत्याह—