विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा संभूत्यामृतम् अश्नुते ॥ १४ ॥
saṃbhūtiṃ ca vināśaṃ ca yas tad vedobhayaṃ saha .
vināśena mṛtyuṃ tīrtvā saṃbhūtyāmṛtam aśnute .. 14 ..
जो पुरुष सम्भूति और विनाश—इन दोनों की उपासना के समुच्चय को जानता है वह—जिसके कार्य का धर्म विनाश है और उस धर्मी से अभेद होने के कारण जो स्वयं भी विनाश कहा जाता है—उस विनाश से अर्थात् उसकी उपासना से अधर्म तथा कामना आदि दोषों से उत्पन्न हुए अनैश्वर्यरूप मृत्यु को पार करके—हिरण्यगर्भ की उपासना से अणिमादि ऐश्वर्य की प्राप्तिरूप फल ही मिलता है, अतः उससे अनैश्वर्य आदि मृत्यु को पार करके—असम्भूति—अव्यक्तोपासना से प्रकृतिलयरूप अमृत प्राप्त कर लेता है ।
‘सम्भूतिं च विनाशं च’ इस पदसमूह में प्रकृतिलयरूप फल बतलानेवाली श्रुति के अनुरोध से अवर्ण के लोपपूर्वक निर्देश हुआ समझना चाहिये[ * ] ॥ १४ ॥
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सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयग्ँ सह विनाशो धर्मो यस्य कार्यस्य स तेन धर्मिणा अभेदेन उच्यते विनाश इति, तेन तदुपासनेनानैश्वर्यमधर्मकामादिदोषजातं च मृत्युं तीर्त्वा— हिरण्यगर्भोपासनेनापि ह्यणिमादिप्राप्तिः फलम्, तेनानैश्वर्यादिमृत्युमतीत्य— असम्भूत्या अव्याकृतोपासनया अमृतं प्रकृतिलयलक्षणमश्नुते ।
सम्भूतिं च विनाशं चेत्यत्रावर्णलोपेन निर्देशो द्रष्टव्यः प्रकृतिलयफलश्रुत्यनुरोधात् ॥ १४ ॥
उपासककी मार्गयाचना
शास्त्र के बतलाये हुए प्रकृतिलयपर्यन्त समस्त फल [गौ, भूमि और सुवर्ण आदि] मानुष-सम्पत्ति तथा [देवताज्ञानरूप] भी दैवी-सम्पत्ति से सम्पन्न होनेवाले हैं । यहाँतक संसार की गति है । इससे आगे पहले ‘आत्मैवाभूद्विजानतः’ (इस सातवें मन्त्र) में बतलाया हुआ सम्पूर्ण एषणाओं के त्यागरूप संन्यास का फल सर्वात्मभाव ही है । इस प्रकार यहाँ प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप दो प्रकार का वेदार्थ प्रकाशित किया है । उनमें विधि-प्रतिषेधरूप सम्पूर्ण प्रवृत्तिलक्षण वेदार्थ का प्रकाश करने में प्रवर्ग्यपर्यन्त ब्राह्मणभाग उपयोगी है तथा निवृत्तिलक्षण वेदार्थ को अभिव्यक्त करने में इससे आगे बृहदारण्यक का उपयोग किया जाता है ।
उनमें जो पुरुष गर्भाधान से लेकर मरणपर्यन्त कर्म करते हुए ही जीवित रहना चाहता है, उसे अपरब्रह्मविषयक विद्या के साथ ही (जीवित रहना चाहिये) जैसा कि कहा है—‘जो विद्या और अविद्या—इन दोनों को ही एक साथ जानता है वह अविद्या (कर्म)-से मृत्यु को पार करके विद्या (देवता-ज्ञान)-से अमृत प्राप्त कर लेता है ।’
अब अमृतत्व किस मार्ग से प्राप्त करता है? सो बतलाते हैं । वह जो सत्य है वही यह आदित्य है । जो इस आदित्यमण्डल में पुरुष है तथा जो पुरुष दक्षिण नेत्र में है, वे दोनों ही सत्य हैं । जो उस ब्रह्म की उपासना करनेवाला और शास्त्रोक्त कर्म करनेवाला है, वह अन्तकाल उपस्थित होने पर [इस आदित्यमण्डलस्थ] आत्मा से ‘हिरण्मयेन पात्रेण०’ इस मन्त्र के द्वारा इस प्रकार आत्मप्राप्ति के द्वार की याचना करता है—
[ * ]: अर्थात् ‘असम्भूति’ को ही ‘सम्भूति’ कहा है—ऐसा जानना चाहिये ।
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मानुषदैववित्तसाध्यं फलं भोगमोक्ष- शास्त्रलक्षणं प्रकृतिविवेकः लयान्तम् । एतावती संसारगतिः । अतः परं पूर्वोक्तमात्मैवाभूद्विजानत इति सर्वात्मभाव एव सर्वैषणासंन्यासज्ञाननिष्ठाफलम् । एवं द्विप्रकारः प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणो वेदार्थोऽत्र प्रकाशितः । तत्र प्रवृत्तिलक्षणस्य वेदार्थस्य विधिप्रतिषेधलक्षणस्य कृत्स्नस्य प्रकाशने प्रवर्ग्यान्तं ब्राह्मणमुपयुक्तम् । निवृत्तिलक्षणस्य वेदार्थस्य प्रकाशनेऽत ऊर्ध्वं बृहदारण्यकमुपयुक्तम् ।
तत्र निषेकादिश्मशानान्तं कर्म कुर्वन् जिजीविषेद्यो विद्यया सहापरब्रह्मविषयया तदुक्तं ‘विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयग्ँसह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते’ इति ।
तत्र केन मार्गेणामृतत्वदेवयानमार्गमश्नुत इत्युच्यते । याचनम् तद्यत्तत्सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुष एतदुभयग्ँसत्यम् । ब्रह्मोपासीनो यथोक्तकर्मकृच्च यः सोऽन्तकाले प्राप्ते सत्यात्मानमात्मनः प्राप्तिद्वारं याचते ‘हिरण्मयेन पात्रेण०’ इति ।