मन्त्र 15

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत् त्वं पूषन्न् अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥

hiraṇmayena pātreṇa satyasyāpihitaṃ mukham .
tat tvaṃ pūṣann apāvṛṇu satyadharmāya dṛṣṭaye .. 15 ..


आदित्यमण्डलस्थ ब्रह्म का मुख ज्योतिर्मय पात्र से ढका हुआ है । हे पूषन्! मुझ सत्यधर्मा को आत्मा की उपलब्धि कराने के लिये तू उसे उघाड़ दे ॥ १५ ॥
जो सोने का-सा हो उसे ‘हिरण्मय’ कहते हैं, अर्थात् जो ज्योतिर्मय है उस ढकनेरूप पात्र से ही आदित्यमण्डल में स्थित सत्य अर्थात् ब्रह्म का मुख—द्वार छिपा हुआ है । हे पूषन्! सत्य की उपासना करने के कारण जिसका सत्य ही धर्म है ऐसा मैं सत्यधर्मा हूँ, उस मेरे प्रति अथवा यथार्थ धर्म का अनुष्ठान करनेवाले मेरे प्रति दृष्टि अर्थात् अपने सत्यस्वरूप की उपलब्धि के लिये तू उसे उघाड़ दे—[उस पात्र को] सामने से हटा दे ॥ १५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
हिरण्मयमिव हिरण्मयं ज्योतिर्मयमित्येतत् । तेन पात्रेणेव अपिधानभूतेन सत्यस्यैवादित्यमण्डलस्थस्य ब्रह्मणोऽपिहितम् आच्छादितं मुखं द्वारम् । तत्त्वं हे पूषन्नपावृण्वपसारय सत्यस्य उपासनात्सत्यं धर्मो यस्य मम सोऽहं सत्यधर्मा तस्मै मह्यमथवा यथाभूतस्य धर्मस्यानुष्ठात्रे दृष्टये तव सत्यात्मन उपलब्धये ॥ १५ ॥