यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि योऽसाव् असौ पुरुषः सोऽहम् अस्मि ॥ १६ ॥
pūṣann ekarṣe yama sūrya prājāpatya vyūha raśmīn samūha tejaḥ .
yat te rūpaṃ kalyāṇatamaṃ tat te paśyāmi yo’sāv asau puruṣaḥ so’ham asmi .. 16 ..
हे पूषन्! जगत् का पोषण करने के कारण सूर्य पूषा है । वह अकेला ही चलता है इसलिये एकर्षि है—हे एकर्षे! सबका नियमन करने के कारण यम है—हे यम! किरण, प्राण और रसों को स्वीकार करने के कारण सूर्य है—हे सूर्य! प्रजापति का पुत्र होने से प्राजापत्य है—हे प्राजापत्य! अपनी किरणों को दूर कर । अपने तेज यानी सन्तप्त करनेवाली ज्योति को पुंजीभूत एकत्रित अर्थात् शान्त कर ।
तेरा जो अत्यन्त कल्याणमय अर्थात् परम सुन्दर स्वरूप है, उसे तुझ आत्मा की कृपा से मैं देखता हूँ तथा यह बात मैं तुझसे सेवक के समान याचना नहीं करता; क्योंकि यह जो व्याहृतिरूप अंगोंवाला[] आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है—जो पुरुषाकार होने से अथवा जो प्राण और बुद्धिरूप से समस्त जगत् को पूर्ण किये हुए है या जो शरीररूप पुर में शयन करने के कारण पुरुष है—वह मैं ही हूँ ॥ १६ ॥
[ * ]: ‘तस्य भूरिति शिरः, भुवरिति बाहू, सुवरिति प्रतिष्ठा’ (बृ० उ० ५ । ५ । ३) । अर्थात् उसका ‘भूः’ यह सिर है, ‘भुवः’ यह भुजाएँ हैं तथा ‘सुवः’ यह प्रतिष्ठा (चरण) है ।
संस्कृत भाष्य पढ़ें
हे पूषन्! जगतः पोषणात्पूषा । रविस्तथैक एव ऋषति गच्छति इत्येकर्षिः—हे एकर्षे! तथा सर्वस्य संयमनाद्यमः—हे यम! तथा रश्मीनां प्राणानां रसानाञ्च स्वीकरणात् सूर्यः—हे सूर्य! प्रजापतेरपत्यं प्राजापत्यः—हे प्राजापत्य! व्यूह विगमय रश्मीन्स्वान् । समूह एकीकुरु उपसंहरते तेजस्तापकं ज्योतिः ।
यत्ते तव रूपं कल्याणतमम् अत्यन्तशोभनं तत्ते तवात्मनः प्रसादात् पश्यामि । किञ्चाहं न तु त्वां भृत्यवद्याचे योऽसावादित्यमण्डलस्थो व्याहृत्यवयवः पुरुषः पुरुषाकारत्वात्पूर्णं वानेन प्राणबुद्ध्यात्मना जगत्समस्तमिति पुरुषः पुरि शयनाद्वा पुरुषः सोऽहमस्मि भवामि ॥ १६ ॥