मन्त्र 17

वायुर् अनिलम् अमृतम् अथेदं भस्मान्तं शरीरम् ।
ओं क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ १७ ॥

vāyur anilam amṛtam athedaṃ bhasmāntaṃ śarīram .
oṃ krato smara kṛtaṃ smara krato smara kṛtaṃ smara .. 17 ..


अब मेरा प्राण सर्वात्मक वायुरूप सूत्रात्मा को प्राप्त हो और यह शरीर भस्मशेष हो जाय । हे मेरे संकल्पात्मक मन! अब तू स्मरण कर, अपने किये हुए को स्मरण कर, अब तू स्मरण कर, अपने किये हुए को स्मरण कर ॥ १७ ॥

अब मुझ मरनेवाले का वायु— प्राण अपने अध्यात्मपरिच्छेद को त्यागकर अधिदैवरूप सर्वात्मक वायुरूप अमृत यानी सूत्रात्मा को प्राप्त हो—इस प्रकार इस वाक्य में ‘प्रतिपद्यताम्’ यह क्रियापद जोड़ लेना चाहिये । यहाँ यह समझना चाहिये कि ज्ञान और कर्म के संस्कारों से युक्त यह लिंग-देह उत्क्रमण करे, क्योंकि इस [श्रुति से] मार्ग की याचना की गयी है तथा अब यह शरीर अग्नि में होम कर दिये जाने पर भस्मशेष हो जाय ।

‘ॐ’ ऐसा कहकर यहाँ उपासना के अनुसार सत्यस्वरूप अग्निसंज्ञक ब्रह्म ही अभेदरूप से कहा गया है; क्योंकि ‘ॐ’ उसका प्रतीक है । हे क्रतो! संकल्पात्मक मन! तू इस समय जो मेरा स्मरणीय है उसका स्मरण कर, अब यह उसका समय उपस्थित हो गया है, अतः तू स्मरण कर । बाल्यावस्था से लेकर इतने काल तक मैंने जिस कर्म का पहले अनुष्ठान किया है, उसका भी स्मरण कर । ‘क्रतो स्मर कृतं स्मर’ यहाँ (‘स्मर’ पद की) पुनरुक्ति आदर के लिये है ॥ १७ ॥

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अथेदानीं मम मरिष्यतो वायुः प्राणोऽध्यात्मपरिच्छेदं हित्वाधिदैवतात्मानं सर्वात्मकमनिलममृतं सूत्रात्मानं प्रतिपद्यतामिति वाक्यशेषः । लिङ्गं चेदं ज्ञानकर्मसंस्कृतमुत्क्रामत्विति द्रष्टव्यम्, मार्गयाचनसामर्थ्यात् । अथेदं शरीरमग्नौ हुतं भस्मान्तं भूयात् ।

ओमिति यथोपासनम् ॐ प्रतीकात्मकत्वात्सत्यात्मकमग्न्याख्यं ब्रह्माभेदेनोच्यते । हे क्रतो! सङ्कल्पात्मक! स्मर यन्मम स्मर्तव्यं तस्य कालोऽयं प्रत्युपस्थितोऽतः स्मर । एतावन्तं कालं भावितं कृतमग्ने स्मर यन्मया बाल्यप्रभृत्यनुष्ठितं कर्म तच्च स्मर । क्रतो स्मर कृतं स्मरेति पुनर्वचनमादरार्थम् ॥ १७ ॥


पुनः दूसरे मन्त्र से मार्ग की याचना करता है—
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पुनरन्येन मन्त्रेण मार्गं याचते—