युयोध्य् अस्मज् जुहुराणम् एनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ १८ ॥
agne naya supathā rāye asmān viśvāni deva vayunāni vidvān .
yuyodhy asmaj juhurāṇam eno bhūyiṣṭhāṃ te nama uktiṃ vidhema .. 18 ..
हे अग्ने! मुझे सुपथ अर्थात् सुन्दर मार्ग से ले चल । यहाँ ‘सुपथा’ यह विशेषण दक्षिणमार्ग की निवृत्ति के लिये है । मैं आवागमनरूप दक्षिणमार्ग से ऊब गया हूँ, अतः तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि यथोक्त कर्मफलविशिष्ट हमलोगों को हमारे सम्पूर्ण कर्म अथवा ज्ञानों को जानने वाले हे देव! तू ‘राये’—धन के लिये अर्थात् कर्मफलभोग के निमित्त पुनः-पुनः आने-जाने से रहित शुभमार्ग से ले चल ।
तथा तू हमसे कुटिल अर्थात् वञ्चनात्मक पापों को ‘युयोधि’—वियुक्त कर दे यानी उनका नाश कर दे । तब हम विशुद्ध होकर अपना इष्ट प्राप्त कर लेंगे—यह इसका अभिप्राय है । किन्तु इस समय हम तेरी परिचर्या (सेवा) करने में समर्थ नहीं हैं । अतः हम तेरे लिये बहुत-सी ‘नमः’ उक्ति यानी नमस्कार-वचन विधान करते हैं अर्थात् नमस्कार से ही तेरी परिचर्या करते हैं ।
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हे अग्ने! नय गमय सुपथा शोभनेन मार्गेण । सुपथेति विशेषणं दक्षिणमार्गनिवृत्त्यर्थम् । निर्विण्णोऽहं दक्षिणेन मार्गेण गतागतलक्षणेनातो याचे त्वां पुनः पुनर्गमनागमनवर्जितेन शोभनेन पथा नय । राये धनाय कर्मफलभोगायेत्यर्थः, अस्मान्यथोक्तधर्मफलविशिष्टान् विश्वानि सर्वाणि हे देव! वयुनानि कर्माणि प्रज्ञानानि वा विद्वान्जानन् ।
किञ्च युयोधि वियोजय विनाशय अस्मदस्मत्तो जुहुराणं कुटिलं वञ्चनात्मकमेनः पापम् । ततो वयं विशुद्धाः सन्त इष्टं प्राप्स्याम इत्यभिप्रायः । किन्तु वयमिदानीं ते न शक्नुमः परिचर्यां कर्तुम् । भूयिष्ठां बहुतरां ते तुभ्यं नम उक्तिं नमस्कारवचनं विधेम नमस्कारेण परिचरेम इत्यर्थः ।
ग्रन्थार्थ-विवेचन
‘अविद्या (कर्म)-से मृत्यु को पारकर विद्या (देवताज्ञान)-से अमृत प्राप्त करता है ।’ विनाश (कार्यब्रह्म की उपासना)-से मृत्यु को पारकर सम्भूति (अव्यक्त की उपासना)-से अमृत लाभ करता है’—
ऐसा सुनकर कुछ लोगों को संशय हो जाता है । अतः उसकी निवृत्ति के लिये हम संक्षेप से विचार करते हैं—
अच्छा तो, यहाँ किस निमित्त को लेकर संशय होता है? इसपर कहते हैं—
पूर्व०—यहाँ ‘विद्या’ शब्द से मुख्य परमार्थविद्या तथा ‘अमृत’ शब्द से अमृतत्व ही क्यों नहीं लिया जाता?
सिद्धान्ती—ऊपर बतलायी हुई परमार्थविद्या और कर्म का परस्पर विरोध होने के कारण उनका समुच्चय नहीं हो सकता ।
पूर्व०—ठीक है, परन्तु इनका विरोध या अविरोध तो शास्त्रप्रमाण से ही सिद्ध हो सकता है; अतः (यहाँ शास्त्रविधि होने के कारण) इनका विरोध नहीं जान पड़ता । जिस प्रकार अविद्या का अनुष्ठान और विद्या की उपासना शास्त्रप्रमाण से सिद्ध है, उसी प्रकार उनके विरोध और अविरोध भी हैं । जैसे ‘सभी प्राणियों की हिंसा न करे’ यह बात शास्त्र से जानी जाती है और फिर ‘यज्ञ में पशु की हिंसा करे’ इस शास्त्रविधि से ही बाधित भी हो जाती है, वैसे ही विद्या और अविद्या के सम्बन्ध में भी हो सकता है और इस प्रकार विद्या तथा कर्म का समुच्चय हो जायगा ।
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि श्रुति कहती है—“जिनकी गति भिन्न-भिन्न हैं, वे विद्या और कर्म सर्वथा विपरीत हैं ।”
पूर्व०—किन्तु ‘विद्यां चाविद्यां च’ इस वाक्य के अनुसार इन दोनों का अविरोध है न?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि उनके हेतु, स्वरूप और फलों में विरोध है ।
पूर्व०—विद्या और अविद्या तथा विरोध और अविरोध इनमें विकल्प तो हो नहीं सकता तथा इनके समुच्चय का विधान किया गया है, इसलिये इनका अविरोध ही है—ऐसा मानें तो?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि इन दोनों का साथ रहना सम्भव नहीं है ।
पूर्व०—यदि ऐसा मानें कि विद्या और अविद्या क्रम से एक आश्रय में रहनेवाली हैं, तो?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि विद्या के उत्पन्न हो जाने पर अविद्या का नाश हो जाता है और फिर उसी आश्रय में अविद्या की उत्पत्ति नहीं हो सकती । ‘अग्नि उष्ण और प्रकाशस्वरूप है’ इस ज्ञान के उत्पन्न होने पर जिस [अग्निरूप] आश्रय में यह उत्पन्न हुआ है उसी में अग्नि शीतल और अप्रकाशमय है—ऐसा अज्ञान नहीं हो सकता; अधिक क्या इस विषय में उस पुरुष को कोई संदेह अथवा भ्रम भी नहीं हो सकता । ज्ञानी के लिये शोक-मोहादि को असम्भव बतलानेवाली ‘यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः’ इस श्रुति से भी यही सिद्ध होता है । इस प्रकार अविद्या के असम्भव हो जाने पर उसके आश्रय से होनेवाले कर्म भी नहीं हो सकते—यह बात हम पहले ही कह चुके हैं ।
यहाँ जो कहा गया है कि अमृत को प्राप्त होता है सो आपेक्षिक अमृत समझना चाहिये । यदि ‘विद्या’ शब्द से परमात्मविद्या ली जाय तो ‘हिरण्मयेन’ इत्यादि मन्त्रों से मार्गादि की याचना नहीं बन सकती । इसलिये यहाँ उपासना के साथ ही (कर्म का) समुच्चय किया गया है, परमात्मज्ञान के साथ नहीं । इस प्रकार इन मन्त्रों का वही अर्थ है, जैसा कि हमने व्याख्यान किया है । ऐसा कहकर हम विराम लेते हैं ॥ १८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते’ (ई० उ० ११) ‘विनाशेन मृत्युं तीर्त्वासम्भूत्यामृतमश्नुते’ (ई० उ० १४) इति श्रुत्वा केचित्संशयं कुर्वन्ति । अतस्तन्निराकरणार्थं संक्षेपतो विचारणां करिष्यामः ।
तत्र तावत्किन्निमित्तः संशय इत्युच्यते ।
विद्याशब्देन मुख्या परमात्मविद्यैव कस्मान्न गृह्यतेऽमृतत्वञ्च ।
ननुक्तायाः परमात्मविद्यायाः कर्मणश्च विरोधात्समुच्चयानुपपत्तिः ।
सत्यम् । विरोधस्तु नावगम्यते विरोधाविरोधयोः शास्त्रप्रमाणकत्वात् । यथाविद्यानुष्ठानं विद्योपासनञ्च शास्त्रप्रमाणकं तथा तद्विरोधाविरोधावपि । यथा च न हिंस्यात्सर्वा भूतानीति शास्त्रादवगतं पुनः शास्त्रेणैव बाध्यतेऽध्वरे पशुं हिंस्यादिति । एवं विद्याविद्ययोरपि स्यात् । विद्याकर्मणोश्च समुच्चयः ।
न “दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्या” (क० उ० १ । २ । ४) इति श्रुतेः ।
विद्यां चाविद्यां चेति वचनादविरोध इति चेत्?
न; हेतुस्वरूपफलविरोधात् ।
विद्याविद्याविरोधाविरोधयोर्विकल्पासम्भवात्समुच्चयविधानादविरोध एवेति चेत्?
न; सहसम्भवानुपपत्तेः ।
क्रमेणैकाश्रये स्यातां विद्याविद्ये इति चेत्?
न; विद्योत्पत्तौ अविद्याया ह्यस्तत्वात्तदाश्रयेऽविद्यानुपपत्तेः । न ह्यग्निरुष्णः प्रकाशश्चेति विज्ञानोत्पत्तौ यस्मिन्नाश्रये तदुत्पन्नं तस्मिन्नेवाश्रये शीतोऽग्निरप्रकाशो वेत्यविद्याया उत्पत्ति- र्नापि संशयोऽज्ञानं वा “यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ई० उ० ७) इति शोकमोहाद्यसम्भवश्रुतेः । अविद्यासम्भवात्तदुपादानस्य कर्मणोऽप्यनुपपत्तिम् अवोचाम ।
अमृतमश्नुत इत्यापेक्षिकम् अमृतम् । विद्याशब्देन परमात्मविद्याग्रहणे हिरण्मयेनेत्यादिना द्वारमार्गादियाचनमनुपपन्नं स्यात् । तस्मादुपासनया समुच्चयो न परमात्मविज्ञानेनेति यथास्माभिर्व्याख्यात एव मन्त्राणामर्थ इत्युपरम्यते ॥ १८ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतावीशावास्योपनिषद्भाष्यं सम्पूर्णम् ।
हरिः ॐ तत्सत्
क्योंकि विद्या-अविद्या तथा विरोध-अविरोध ये सिद्ध वस्तुएँ हैं । जो बात पुरुष के अधीन होती है अर्थात् जिसे पुरुष कर सकता है उसी में विकल्प भी हो सकता है । जैसे सूर्योदय के अनन्तर हवन करे—इस विधि में यह विकल्प हो सकता है कि सूर्योदय से पहले करे या पीछे, ‘परन्तु सूर्य है’ इस बात में सूर्य है या नहीं—ऐसा कोई विकल्प नहीं हो सकता; क्योंकि सूर्य का होना या न होना किसी पुरुषविशेष के अधीन नहीं है ।