एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥
kurvann eveha karmāṇi jijīviṣecchataṃ samāḥ .
evaṃ tvayi nānyatheto’sti na karma lipyate nare .. 2 ..
इस लोक में अग्निहोत्रादि कर्म करते हुए ही सौ तक अर्थात् सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करे, पुरुष की बड़ी-से-बड़ी आयु इतनी ही बतलायी गयी है । अतः उस प्राप्त हुई आयु का अनुवाद करते हुए यह विधान किया है कि यदि सौ वर्ष जीने की इच्छा करे तो कर्म करते हुए ही जीना चाहे ।
इस तरह, इस प्रकार जीने की इच्छा करनेवाले तुझ मनुष्य—मनुष्यत्वमात्र का अभिमान करनेवाले के लिये इस अर्थात् अग्निहोत्रादि कर्म करते हुए ही [आयु बिताने के] वर्तमान प्रकार से भिन्न और कोई ऐसा प्रकार नहीं है, जिससे अशुभ कर्म का लेप न हो । अर्थात् जिससे वह पुरुष कर्म से लिप्त न हो । अतः अग्निहोत्र आदि शास्त्रविहित कर्मों को करते हुए ही जीने की इच्छा करे ।
पूर्व०—यह कैसे जाना गया कि पूर्व मन्त्र से संन्यासी की ज्ञाननिष्ठा का तथा द्वितीय मन्त्र से संन्यास में असमर्थ पुरुष की कर्मनिष्ठा का वर्णन किया गया है?
सिद्धान्ती—कहते हैं, क्या तुम्हें स्मरण नहीं है कि जैसा पहले (सम्बन्धभाष्य में) कह चुके हैं ज्ञान और कर्म का विरोध पर्वत के समान अविचल है । यहाँ भी ‘जो जीने की इच्छा करे वह कर्म करते हुए ही [जीना चाहे]’ तथा ‘यह सब ईश्वर से आच्छादन करनेयोग्य है’ ‘उस (चराचर जगत्)-के त्यागद्वारा आत्मा की रक्षा कर’ ‘किसी के धन की इच्छा न कर’ इत्यादि वाक्यों से [कर्मी और संन्यासी की निष्ठाओं का भेद ही] निरूपण किया है । तथा ‘जीवन या मरण का लोभ न करे, वन को चला जाय—यही वेद की मर्यादा है । और फिर वहाँ से घर न लौटे’ इस वाक्य से भी [ज्ञाननिष्ठ के लिये] संन्यास का ही विधान किया है । आगे इन दोनों निष्ठाओं के फल का भेद भी बतलायेंगे ।
ये दोनों ही मार्ग सृष्टि के आरम्भ से परम्परागत हैं । इनमें पहले कर्ममार्ग है और पीछे संन्यास । [संन्यासरूप] निवृत्तिमार्ग से तीनों एषणाओं का त्याग किया जाता है । इन दोनों में संन्यासमार्ग ही उत्कर्ष प्राप्त करता है । तैत्तिरीय श्रुति में भी कहा है कि ‘संन्यास ही उत्कृष्टता को प्राप्त हुआ ।’ वेदाचार्य भगवान् व्यास ने भी बहुत सोच-विचारकर ही अपने पुत्र से यह निश्चित बात कही है—‘जिनमें वेद प्रतिष्ठित हैं ऐसे ये दो ही मार्ग हैं—एक तो प्रवृत्तिलक्षण धर्ममार्ग और दूसरा अच्छी तरह भावना किया हुआ निवृत्तिमार्ग ।’ इन दोनों का विभाग हम आगे दिखलायेंगे ॥ २ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
कुर्वन्नेव इह निर्वर्तयन्नेव कर्माण्यग्निहोत्रादीनि जिजीविषेज्जीवितुमिच्छेच्छतं शतसङ्ख्याकाः समाः संवत्सरान् । तावद्धि पुरुषस्य परमायुर्निरूपितम् । तथा च प्राप्तानुवादेन यज्जिजीविषेच्छतं वर्षाणि तत् कुर्वन्नेव कर्माणीत्येतद्विधीयते ।
एवमेवम्प्रकारेण त्वयि जिजीविषति नरे नरमात्राभिमानिनीत एतस्मादग्निहोत्रादीनि कर्माणि कुर्वतो वर्तमानात्प्रकारादन्यथा प्रकारान्तरं नास्ति येन प्रकारेणाशुभं कर्म न लिप्यते कर्मणा न लिप्यत इत्यर्थः । अतः शास्त्रविहितानि कर्माण्यग्निहोत्रादीनि कुर्वन्नेव जिजीविषेत् ।
कथं पुनरिदमवगम्यते पूर्वेण संन्यासिनो ज्ञाननिष्ठोक्ता ज्ञानकर्म- द्वितीयेन तदशक्तस्य समुच्चयखण्डनम् कर्मनिष्ठेति ।
उच्यते; ज्ञानकर्मणोर्विरोधं पर्वतवदकम्प्यं यथोक्तं न स्मरसि किम् । इहाप्युक्तं ‘यो हि जिजीविषेत् स कर्म कुर्वन्’ ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः’ ‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्’ इति च । ‘न जीविते मरणे वा गृधिं कुर्वीतारण्यमियादिति च पदम्; ततो न पुनरियात्’ इति संन्यासशासनात् । उभयोः फलभेदं च वक्ष्यति ।
इमौ द्वावेव पन्थानावनुनिष्क्रान्ततरौ भवतः क्रियापथश्चैव पुरस्तात्संन्यासश्चोत्तरेण । निवृत्तिमार्गेण एषणात्रयस्य त्यागः । तयोः संन्यासपथ एवातिरेचयति । “न्यास एवात्यरेचयत्” इति च तैत्तिरीयके । ‘द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः । प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तौ च सुभाषितः ॥ ’ (महा०, शा० २४१ । ६) इत्यादि पुत्राय विचार्य निश्चितमुक्तं व्यासेन वेदाचार्येण भगवता । विभागञ्चानयोः दर्शयिष्यामः ॥ २ ॥