मन्त्र 3

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥

asuryā nāma te lokā andhena tamasāvṛtāḥ .
tāṃste pretyābhigacchanti ye ke cātmahano janāḥ .. 3 ..


वे असुरसम्बन्धी लोक आत्मा के अदर्शनरूप अज्ञान से आच्छादित हैं । जो कोई भी आत्मा का हनन करनेवाले लोग हैं, वे मरने के अनन्तर उन्हें प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥

अद्वय परमात्मभाव की अपेक्षा से देवता आदि भी असुर ही हैं । उनके सम्पत्तिस्वरूप लोक ‘असुर्य’ हैं । ‘नाम’ शब्द अर्थहीन निपात है ।

जिनमें कर्मफलों का लोकन—दर्शन यानी भोग होता है, वे लोक अर्थात् जन्म (योनियाँ) अन्ध—अदर्शनात्मक तम यानी अज्ञान से आच्छादित हैं । वे इस शरीर को छोड़कर अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार उन [ब्रह्मा से लेकर] स्थावरपर्यन्त योनियों में ही जाते हैं ।

जो कोई आत्मा का घात (नाश) करते हैं, वे आत्मघाती हैं । वे लोग कौन हैं? जो अज्ञानी हैं । वे सर्वदा अपने आत्मा की किस प्रकार हिंसा करते हैं? अविद्यारूप दोष के कारण अपने नित्यसिद्ध आत्मा का तिरस्कार करने से [अज्ञानी जीवों की दृष्टि में] नित्य विद्यमान आत्मा का अजरामरत्वादिज्ञानरूप कार्य यानी फल मरे हुए के समान तिरोभूत रहता है, इसलिये प्राकृत अज्ञानीजन आत्मघाती कहे जाते हैं । इस आत्मघातरूप दोष के कारण ही वे जन्म-मरण को प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

असुर्याः परमात्मभावमद्वयमपेक्ष्य देवादयोऽप्यसुरास्तेषाञ्च स्वभूता लोका असुर्या नाम । नामशब्दोऽनर्थको निपातः ।

ते लोकाः कर्मफलानि । लोक्यन्ते दृश्यन्ते भुज्यन्त इति जन्मानि । अन्धेनादर्शनात्मकेनाज्ञानेन तमसावृता आच्छादिताः, तान्स्थावरान्तान्प्रेत्य त्यक्त्वेमं देहमभिगच्छन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ।

आत्मानं घ्नन्तीत्यात्महनाः । के ते जनाः, येऽविद्वांसः । कथं त आत्मानं नित्यं हिंसन्ति । अविद्यादोषेण विद्यमानस्यात्मनस्तिरस्करणात् । विद्यमानस्य आत्मनो यत्कार्यं फलमजरामरत्वादिसंवेदनलक्षणं तद्धतस्येव तिरोभूतं भवतीति प्राकृताविद्वांसो जना आत्महन उच्यन्ते तेन ह्यात्महननदोषेण संसरन्ति ते ॥ ३ ॥


आत्मा का स्वरूप

जिस आत्मा का हनन करने से अज्ञानीलोग जन्म-मरणरूप संसार को प्राप्त होते हैं और उसके विपरीत ज्ञानीलोग मुक्त हो जाते हैं—वे आत्मघाती नहीं होते—वह आत्मतत्त्व कैसा है? सो बतलाया जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यस्यात्मनो हननादविद्वांसः संसरन्ति तद्विपर्ययेण विद्वांसो जना मुच्यन्ते ते नात्महनः, तत् कीदृशमात्मतत्त्वमित्युच्यते—