मन्त्र 4

अनेजद् एकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्न् अपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥

anejad ekaṃ manaso javīyo nainaddevā āpnuvanpūrvamarṣat .
taddhāvato’nyānatyeti tiṣṭhat tasminn apo mātariśvā dadhāti .. 4 ..


वह आत्मतत्त्व अपने स्वरूप से विचलित न होने वाला, एक तथा मन से भी तीव्र गति वाला है । इसे इन्द्रियाँ प्राप्त नहीं कर सकीं; क्योंकि यह उन सबसे पहले (आगे) गया हुआ (विद्यमान) है । वह स्थिर होने पर भी अन्य सब गतिशीलों को अतिक्रमण कर जाता है । उसके रहते हुए ही [अर्थात् उसकी सत्ता में ही] वायु समस्त प्राणियों के प्रवृत्तिरूप कर्मों का विभाग करता है ॥ ४ ॥

जो चलने वाला न हो उसे ‘अनेजत्’ कहते हैं, क्योंकि ‘एजृ कम्पने’ [इस धातुसूत्र से] ‘एज्’ धातु का अर्थ कम्पन है । इस प्रकार [वह आत्मतत्त्व] कम्पन—चलन अर्थात् अपनी अवस्था से च्युत होने से रहित है यानी सदा एकरूप है । वह एक ही सब प्राणियों में वर्तमान है तथा संकल्पादिरूप मन से भी जवीय—अधिक वेगवान् है ।

पूर्व०—यह विरुद्ध बात कैसे कही जाती है कि वह आत्मतत्त्व ध्रुव एवं निश्चल है तथा मन से भी अधिक वेगवान् है?

सिद्धान्ती—यह कोई दोष नहीं है? क्योंकि निरुपाधिक और सोपाधिकरूप से यह विरुद्ध कथन भी बन सकता है; उस अवस्था में अपने निरुपाधिकरूप से तो ‘अविचल’ और ‘एक’—ऐसा कहा जाता है तथा अन्तःकरण की मनरूप संकल्पविकल्पात्मिका उपाधि का अनुवर्तन करने के कारण [मन से भी अधिक वेगवान् कहा गया है ।] इस लोक में देहस्थ मन का ब्रह्मलोक आदि दूर देशों में संकल्परूप से एक क्षण में ही गमन हो जाता है, अतः मन का अत्यन्त वेगवत्व तो लोक में प्रसिद्ध ही है । किन्तु उस मन के ब्रह्मलोकादि में बड़ी शीघ्रता से पहुँचने पर वहाँ आत्मचैतन्य का अवभास पहलेही से पहुँचा हुआ-सा अनुभव किया जाता है । इसीसे ‘वह मन से भी अधिक वेगवान् है’ ऐसा श्रुति कहती है ।

जिसका प्रकरण चल रहा है ऐसे इस आत्मतत्त्व को देवगण भी प्राप्त अर्थात् उपलब्ध नहीं कर सके ।

विषयों का द्योतन (प्रकाश) करने के कारण चक्षु आदि इन्द्रियाँ ही ‘देव’ हैं । उन इन्द्रियों से तो मन ही वेगवान् है, अतः [आत्मा तथा इन्द्रियों के बीच में] मनोव्यापार का व्यवधान रहने के कारण आत्मा का तो आभासमात्र भी इन्द्रियों का विषय नहीं होता ।

क्योंकि आकाश के समान व्यापक होने के कारण वह वेगवान् मन से भी पहले ही गया हुआ है । वह सर्वव्यापी आत्मतत्त्व अपने निरुपाधिक स्वरूप से सम्पूर्ण संसारधर्मों से रहित तथा अविक्रिय होकर ही उपाधिकृत सम्पूर्ण सांसारिक विकारों को अनुभव करता है और अविवेकी मूढ़ पुरुषों को प्रत्येक शरीर में अनेक-सा प्रतीत होता है, इसी से श्रुति ने ऐसा कहा है ।

वह दौड़ते अर्थात् तेजी से चलते हुए, आत्मा से भिन्न अन्य मन, वाणी और इन्द्रिय आदि का अतिक्रमण कर जाता है—मानो उन्हें पार करके चला जाता है । ‘इव’ का भावार्थ श्रुति ‘तिष्ठत्’ (ठहरने वाला) इस पद से स्वयं ही दिखला रही है । अर्थात् स्वयं अविकारी रहकर ही दूसरों को पार कर जाता है ।

उस नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मतत्त्व के वर्तमान रहते हुए ही जो मातरि अर्थात् अन्तरिक्ष में संचार—गमन करता है, वह मातरिश्वा—वायु, जो समस्त प्राणों का पोषक और क्रियारूप है, जिसके अधीन ये सारे शरीर और इन्द्रिय हैं तथा जिसमें ये सब ओत-प्रोत हैं और जो सूत्रसंज्ञक तत्त्व निखिल जगत् का विधाता है, वह मातरिश्वा अप् अर्थात् प्राणियों के चेष्टारूप कर्म यानी अग्नि, सूर्य और मेघ आदि के ज्वलन, दहन, प्रकाशन एवं वर्षा आदि कर्म विभक्त करता है, ऐसा इसका भावार्थ है ।

अथवा “इसके भय से वायु चलता है” इत्यादि [भाववाली] श्रुतियों के अनुसार ‘दधाति’ का अर्थ ‘धारण करता है’ ऐसा जानो । क्योंकि शरीर और इन्द्रिय आदि सभी विकार सबके अधिष्ठानस्वरूप नित्य चैतन्य आत्मतत्त्व के विद्यमान रहते ही होते हैं ॥ ४ ॥

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अनेजत् न एजत् । एजृ कम्पने, कम्पनं चलनं स्वावस्थाप्रच्युतिस्तद्वर्जितं सर्वदैकरूपमित्यर्थः । तच्चैकं सर्वभूतेषु मनसः सङ्कल्पादिलक्षणाद् जवीयो जववत्तरम् ।

कथं विरुद्धमुच्यते ध्रुवं निश्चलमिदं मनसो जवीय इति च ।

नैष दोषः । निरुपाध्युपाधिमत्त्वेनोपपत्तेः तत्र विरोधपरिहारः निरुपाधिकेन स्वेन रूपेणोच्यते अनेजदेकमिति मनसोऽन्तःकरणस्य सङ्कल्पविकल्पलक्षणस्योपाधेरनुवर्त्तनाद् इह देहस्थस्य मनसो ब्रह्मलोकादिदूरगमनं सङ्कल्पेन क्षणमात्राद्भवतीत्यतो मनसो जविष्ठत्वं लोके प्रसिद्धम् । तस्मिन् मनसि ब्रह्मलोकादीन्द्रुतं गच्छति सति प्रथमं प्राप्त इवात्मचैतन्यावभासो गृह्यतेऽतो मनसो जवीय इत्याह ।

नैनद्देवा द्योतनाद्देवाश्चक्षुरादीनीन्द्रियाण्येतत्प्रकृतमात्मतत्त्वं नाप्नुवन्न प्राप्तवन्तः । तेभ्यो मनो जवीयः । मनोव्यापारव्यवहितत्वाद् आभासमात्रमपि आत्मनो नैव देवानां विषयीभवति ।

यस्माज्जवनान्मनसोऽपि पूर्वमर्षत् पूर्वमेव गतं व्योमवद्व्यापित्वात् सर्वव्यापि तदात्मतत्त्वं सर्वसंसारधर्मवर्जितं स्वेन निरुपाधिकेन स्वरूपेणाविक्रियमेव सदुपाधिकृताः सर्वाः संसारविक्रिया अनुभवतीत्यविवेकिनां मूढानामनेकमिव च प्रतिदेहं प्रत्यवभासत इत्येतदाह ।

तद्धावतो द्रुतं गच्छतोऽन्यानात्मविलक्षणान्मनोवागिन्द्रियप्रभृतीन्त्येति अतीत्य गच्छति इव । इवार्थं स्वयमेव दर्शयति तिष्ठदिति स्वयमविक्रियमेव सदित्यर्थः ।

तस्मिन्नात्मतत्त्वे सति नित्यचैतन्यस्वभावे मातरिश्वा मातरि अन्तरिक्षे श्वयति गच्छतीति मातरिश्वा वायुः सर्वप्राणभृत् क्रियात्मको यदाश्रयाणि कार्यकरणजातानि यस्मिन्नोतानि प्रोतानि च यत्सूत्रसंज्ञकं सर्वस्य जगतो विधारयितृ स मातरिश्वा; अपः कर्माणि प्राणिनां चेष्टालक्षणानि, अग्न्यादित्यपर्जन्यादीनां ज्वलनदहनप्रकाशाभिवर्षणादिलक्षणानि दधाति विभजति इत्यर्थः ।

धारयतीति वा “भीषास्माद्वातः पवते” (तै० उ० २ । ८ । १) इत्यादि श्रुतिभ्यः । सर्वा हि कार्यकरणादिविक्रिया नित्यचैतन्यात्मस्वरूपे सर्वास्पदभूते सत्येव भवन्तीत्यर्थः ॥ ४ ॥


मन्त्रों को आलस नहीं होता, अतः पहले मन्त्रद्वारा कहे हुए अर्थ को ही फिर कहते हैं—
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न मन्त्राणां जामितास्तीति पूर्वमन्त्रोक्तमप्यर्थं पुनराह—