तद् एजति तन् नैजति तद् दूरे तद् व् अन्तिके ।
तद् अन्तर् अस्य सर्वस्य तद् उ सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५ ॥
तद् अन्तर् अस्य सर्वस्य तद् उ सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५ ॥
tad ejati tan naijati tad dūre tad v antike .
tad antar asya sarvasya tad u sarvasyāsya bāhyataḥ .. 5 ..
वह आत्मतत्त्व चलता है और नहीं भी चलता । वह दूर है और समीप भी है । वह सबके अन्तर्गत है और वही इस सबके बाहर भी है ॥ ५ ॥
जिसका प्रकरण है वह आत्मतत्त्व एजन करता—चलता है, वही स्वयं नहीं भी चलता अर्थात् स्वयं अचल रहकर ही चलता हुआ-सा जान पड़ता है । यही नहीं, वह दूर भी है; अज्ञानियों को सैकड़ों, करोड़ वर्षों में भी अप्राप्य होने के कारण दूर-जैसा है । [‘तद्वन्तिके’ का] तत् उ अन्तिके—ऐसा पदच्छेद करना चाहिये । वही अन्तिक अत्यन्त समीप भी है अर्थात् केवल दूर ही नहीं, विद्वानों का आत्मा होने के कारण समीप भी है । वह इस सबके अन्तर यानी भीतर भी है जैसा कि “जो आत्मा सर्वान्तर है” इत्यादि श्रुति से सिद्ध होता है । आकाश के समान व्यापक होने के कारण वह इस नामरूप और क्रियात्मक सम्पूर्ण जगत् के बाहर तथा सूक्ष्मरूप होने से इसके भीतर भी है । और श्रुति के “प्रज्ञानघन ही है” इस कथन के अनुसार वह निरन्तर (बाहर-भीतर के भेद को त्यागकर सर्वत्र) ही है ॥ ५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तदात्मतत्त्वं यत्प्रकृतं तदेजति चलति तदेव च नैजति स्वतो नैव चलति स्वतोऽचलमेव सत् चलतीवेत्यर्थः । किञ्च तद्दूरे वर्षकोटिशतैरप्यविदुषामप्राप्यत्वाद् दूर इव । तद् उ अन्तिके इतिच्छेदः । तद्वन्तिके समीपेऽत्यन्तमेव विदुषामात्मत्वान्न केवलं दूरेऽन्तिके च । तदन्तरभ्यन्तरेऽस्य सर्वस्य “य आत्मा सर्वान्तरः” (बृ० उ० ३ । ४ । १) इति श्रुतेः । अस्य सर्वस्य जगतो नामरूपक्रियात्मकस्य तदु अपि सर्वस्य अस्य बाह्यतो व्यापकत्वादाकाशवन्निरतिशयसूक्ष्मत्वाद् अन्तः । “प्रज्ञानघन एव” (बृ० उ० ४ । ५ । १३) इति च शासनान्निरन्तरं च ॥ ५ ॥