मन्त्र 6

यस् तु सर्वाणि भूतान्य् आत्मन्य् एवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥

yas tu sarvāṇi bhūtāny ātmany evānupaśyati .
sarvabhūteṣu cātmānaṃ tato na vijugupsate .. 6 ..


जो [साधक] सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में ही देखता है और समस्त भूतों में भी आत्मा को ही देखता है, वह इस [सार्वात्म्यदर्शन]-के कारण ही किसी से घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥

जो परिव्राट् मुमुक्षु अव्यक्त से लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में ही देखता है अर्थात् उन्हें आत्मा से पृथक् नहीं देखता तथा उन सम्पूर्ण भूतों में भी आत्मा को देखता है अर्थात् उन भूतों के आत्मा को भी अपना ही आत्मा जानता है यानी यह समझता है कि जिस प्रकार मैं इस देह के कार्य (भूत) और करण (इन्द्रिय) संघात का आत्मा और इसकी समस्त प्रतीतियों का साक्षी, चेतयिता, केवल और निर्गुण हूँ उसी प्रकार अपने इसी रूप से अव्यक्त से लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण भूतों का आत्मा भी मैं ही हूँ । इस प्रकार जो सब भूतों में अपने निर्विशेष आत्मस्वरूप को ही देखता है, वह उस आत्मदर्शन के कारण ही किसी से जुगुप्सा यानी घृणा नहीं करता ।

यह प्राप्त वस्तु का ही अनुवाद है । सभी प्रकार की घृणा अपने से भिन्न किसी दूषित पदार्थ को देखनेवाले पुरुष को ही होती है, जो निरन्तर अपने अत्यन्त विशुद्ध आत्मस्वरूप को ही देखनेवाला है, उसकी दृष्टि में घृणा का निमित्तभूत कोई अन्य पदार्थ है ही नहीं; यह बात स्वतः प्राप्त हो जाती है । इसीलिये वह किसी से घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यः परिव्राड् मुमुक्षुः सर्वाणि भूतान्यव्यक्तादीनि स्थावरान्तानि आत्मन्येवानुपश्यत्यात्मव्यतिरिक्तानि न पश्यतीत्यर्थः, सर्वभूतेषु च तेष्वेव चात्मानं तेषामपि भूतानां स्वमात्मानमात्मत्वेन यथास्य देहस्य कार्यकरणसङ्घातस्यात्मा अहं सर्वप्रत्ययसाक्षिभूतश्चेतयिता केवलो निर्गुणोऽनेनैव स्वरूपेणाव्यक्तादीनां स्थावरान्तानामहमेवात्मेति सर्वभूतेषु चात्मानं निर्विशेषं यस्त्वनुपश्यति स ततस्तस्मादेव दर्शनान्न विजुगुप्सते विजुगुप्सां घृणां न करोति ।

प्राप्तस्यैवानुवादोऽयम् । सर्वा हि घृणात्मनोऽन्यद्दुष्टं पश्यतो भवति, आत्मानमेवात्यन्तविशुद्धं निरन्तरं पश्यतो न घृणानिमित्तम् अर्थान्तरमस्तीति प्राप्तमेव । ततो न विजुगुप्सत इति ॥ ६ ॥


इसी बात को दूसरा मन्त्र भी कहता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
इममेवार्थमन्योऽपि मन्त्र आह—