मन्त्र 7

यस्मिन् सर्वाणि भूतान्य् आत्मैवाभूद् विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वम् अनुपश्यतः ॥ ७ ॥

yasmin sarvāṇi bhūtāny ātmaivābhūd vijānataḥ .
tatra ko mohaḥ kaḥ śoka ekatvam anupaśyataḥ .. 7 ..


जिस समय ज्ञानी पुरुष के लिये सब भूत आत्मा ही हो गये, उस समय एकत्व देखनेवाले उस विद्वान् को क्या शोक और क्या मोह हो सकता है ॥ ७ ॥

जिस समय अथवा जिस पूर्वोक्त आत्मस्वरूप में परमार्थतत्त्व को जाननेवाले पुरुष की दृष्टि में वे ही सब भूत परमार्थ आत्मस्वरूप के दर्शन से आत्मा ही हो गये अर्थात् आत्मभाव को ही प्राप्त हो गये, उस समय अथवा उस आत्मा में क्या मोह और क्या शोक रह सकता है; शोक और मोह तो कामना और कर्म के बीज को न जाननेवाले को ही हुआ करते हैं, जो आकाश के समान आत्मा का विशुद्ध एकत्व देखनेवाला है, उसको नहीं होते ।

‘क्या मोह और क्या शोक’; इस प्रकार अविद्या के कार्यस्वरूप शोक और मोह की आक्षेपरूप असम्भवता दिखलाकर कारणसहित संसार का अत्यन्त ही उच्छेद प्रदर्शित किया गया है ॥ ७ ॥

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यस्मिन्काले यथोक्तात्मनि वा तान्येव भूतानि सर्वाणि परमार्थात्मदर्शनादात्मैवाभूद् आत्मैव संवृत्तः परमार्थवस्तु विजानतस्तत्र तस्मिन्काले तत्रात्मनि वा को मोहः कः शोकः । शोकश्च मोहश्च कामकर्मबीजम् अजानतो भवति । न त्वात्मैकत्वं विशुद्धं गगनोपमं पश्यतः ।

को मोहः कः शोक इति शोकमोहयोरविद्याकार्ययोराक्षेपेण असम्भवप्रदर्शनात् सकारणस्य संसारस्यात्यन्तमेवोच्छेदः प्रदर्शितो भवति ॥ ७ ॥


आत्मनिरूपण

उपर्युक्त मन्त्रों से जिस आत्मा का वर्णन किया गया है, वह अपने स्वरूप से कैसे लक्षणोंवाला है, इस बात को यह मन्त्र बतलाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
योऽयमतीतैर्मन्त्रैरुक्त आत्मा स स्वेन रूपेण किंलक्षण इत्याहायं मन्त्रः—