मन्त्र 8

स पर्यगाच् छुक्रम् अकायम् अव्रणम् अस्नाविरं शुद्धम् अपापविद्धम् ।
कविर् मनीषी परिभूः स्ययम्भूर् याथातथ्यतोर्ऽथान् व्यदधाच् छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥

sa paryagāc chukram akāyam avraṇam asnāviraṃ śuddham apāpaviddham .
kavir manīṣī paribhūḥ syayambhūr yāthātathyator’thān vyadadhāc chāśvatībhyaḥ samābhyaḥ .. 8 ..


वह आत्मा सर्वगत, शुद्ध, अशरीरी, अक्षत, स्नायु से रहित, निर्मल, अपापहत, सर्वद्रष्टा, सर्वज्ञ, सर्वोत्कृष्ट और स्वयम्भू (स्वयं ही होनेवाला) है । उसीने नित्यसिद्ध संवत्सर नामक प्रजापतियों के लिये यथायोग्य रीति से अर्थों (कर्तव्यों अथवा पदार्थों)-का विभाग किया है ॥ ८ ॥

वह पूर्वोक्त आत्मा पर्यगात् परि—सब ओर अगात्—गया हुआ है अर्थात् आकाश के समान सर्वव्यापक है, शुक्र—शुद्ध—ज्योतिष्मान् यानी दीप्तिवाला है, अकाय—अशरीरी अर्थात् लिंग-शरीर से रहित है; अव्रण यानी अक्षत है; अस्नाविर है, जिसमें स्नायु अर्थात् शिराएँ न हों उसे अस्नाविर कहते हैं । अव्रण और अस्नाविर—इन दो विशेषणों से स्थूल शरीर का प्रतिषेध किया गया है तथा शुद्ध, निर्मल यानी अविद्यारूप मल से रहित है—इससे कारण-शरीर का प्रतिषेध किया गया है । अपापविद्ध—धर्मअधर्मरूप पाप से रहित है ।

‘शुक्रम्’ इत्यादि (नपुंसकलिंग) वचनों को पुँल्लिङ्ग में परिणत कर लेना चाहिये; क्योंकि ‘स पर्यगात्’ इस पद से आरम्भ करके ‘कविः मनीषी’ आदि शब्दों द्वारा पुँल्लिङ्गरूप से ही उपसंहार किया है ।

कवि—क्रान्तदर्शी यानी सर्वदृक् है । जैसा कि श्रुति कहती है—“इससे अन्य कोई और द्रष्टा नहीं है ।” मनीषी—मन का ईशन करने वाला अर्थात् सर्वज्ञ ईश्वर । परिभू—सबके परि अर्थात् ऊपर है इसलिये परिभू है । स्वयम्भू—स्वयं ही होता है [इसलिये स्वयम्भू है] । अथवा जिनके ऊपर है और जो ऊपर है वह सब स्वयं ही है, इसलिये स्वयम्भू है ।

उस नित्यमुक्त ईश्वर ने सर्वज्ञ होने के कारण यथाभूत कर्म, फल और साधन के अनुसार अर्थों—कर्तव्य-पदार्थों का याथातथ्य विधान किया अर्थात् यथायोग्य रीति से उनका विभाग किया । यथा-तथा के भाव को याथातथ्य कहते हैं । [उसने] शाश्वत—नित्य समाओं अर्थात् संवत्सर नामक प्रजापतियों को [उनकी योग्यता के अनुसार पृथक्-पृथक् कर्तव्य बाँट दिये] ॥ ८ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स यथोक्त आत्मा पर्यगात्परि समन्तादगाद्गतवानाकाशवद्व्यापी इत्यर्थः । शुक्रं शुद्धं ज्योतिष्मद्दीप्तिमानित्यर्थः । अकायमशरीरो लिङ्गशरीरवर्जित इत्यर्थः । अव्रणम् अक्षतम् । अस्नाविरं स्नावाः शिरा यस्मिन्न विद्यन्त इत्यस्नाविरम् । अव्रणमस्नाविरमित्याभ्यां स्थूलशरीरप्रतिषेधः । शुद्धं निर्मलमविद्यामलरहितमिति कारणशरीरप्रतिषेधः । अपापविद्धं धर्माधर्मादिपापवर्जितम् ।

शुक्रमित्यादीनि वचांसि पुँल्लिङ्गत्वेन परिणेयानि । स पर्यगादित्युपक्रम्य कविर्मनीषीत्यादिना पुँल्लिङ्गत्वेनोपसंहारात् ।

कविः क्रान्तदर्शी सर्वदृक् । “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” (बृ० उ० ३ । ७ । २३) इत्यादिश्रुतेः । मनीषी मनस ईषिता सर्वज्ञ ईश्वर इत्यर्थः । परिभूः सर्वेषां पर्युपरि भवतीति परिभूः । स्वयम्भूः स्वयमेव भवतीति । येषामुपरि भवति यश्चोपरि भवति स सर्वः स्वयमेव भवतीति स्वयम्भूः ।

स नित्यमुक्त ईश्वरो याथातथ्यतः सर्वज्ञत्वाद्यथातथाभावो याथातथ्यं तस्माद्यथाभूतकर्मफलसाधनतोऽर्थान् कर्तव्यपदार्थान् व्यदधाद्विहितवान् यथानुरूपं व्यभजदित्यर्थः, शाश्वतीभ्यो नित्याभ्यः समाभ्यः संवत्सराख्येभ्यः प्रजापतिभ्य इत्यर्थः ॥ ८ ॥


ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग

यहाँ “ईशा वास्यमिदं सर्वं········ मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” इस प्रथम मन्त्रद्वारा सम्पूर्ण एषणाओं के त्यागपूर्वक ज्ञाननिष्ठा का वर्णन किया है, यही वेद का प्रथम अर्थ है । तथा जो अज्ञानी और जीवित रहने की इच्छावाले हैं, उनके लिये ज्ञाननिष्ठा सम्भव न होनेपर “कुर्वन्नेवेह कर्माणि—जिजीविषेत्” इत्यादि मन्त्र से कर्मनिष्ठा कही है । यह दूसरा वेदार्थ है ।

उपर्युक्त मन्त्रोंद्वारा दिखलाया हुआ इन निष्ठाओं का विभाग बृहदारण्यक में भी दिखाया है । “उसने इच्छा की कि मेरे पत्नी हो” इत्यादि वाक्यों से यह सिद्ध होता है कि कर्म अज्ञानी और सकाम पुरुष के लिये ही हैं । “मन ही इसका आत्मा है, वाणी स्त्री है” इत्यादि वचन से भी कर्मनिष्ठ का अज्ञानी और सकाम होना तो निश्चितरूप से जाना जाता है । तथा उसी का फल सप्तान्नसर्ग है । उनमें आत्मभावना करने से ही आत्मा की [अनात्मरूप से] स्थिति है ।

आत्मज्ञानियों के लिये तो वहाँ (बृहदारण्यकोपनिषद् में) “जिन हमको यह आत्मलोक ही सम्पादन करना है वे हम प्रजा को लेकर क्या करेंगे ।” इत्यादि वाक्य से जायादि तीन एषणाओं के त्यागपूर्वक कर्मनिष्ठा के विरुद्ध आत्मस्वरूप में स्थिर रहना ही दिखलाया है । जो ज्ञाननिष्ठ संन्यासी हैं उन्हें ही ‘असुर्या नाम ते लोकाः’ यहाँ से लेकर ‘स पर्यगात्’ इत्यादि तक के मन्त्रों से अज्ञानी की निन्दा करते हुए आत्मा के यथार्थ स्वरूप का उपदेश किया है । इस आत्मनिष्ठा में उन्हीं का अधिकार है, सकाम पुरुषों का नहीं । इसी प्रकार श्वेताश्वतर-मन्त्रोपनिषद् में भी “ऋषिसमूह से भली प्रकार सेवित इस परम पवित्र आत्मज्ञान का उत्तम (संन्यास) आश्रमवालों को उपदेश किया” इत्यादि रूप से इसका पृथक् उपदेश किया है ।

जो कर्मनिष्ठ कर्मठ लोग कर्म करते हुए ही जीवित रहना चाहते हैं उनसे यह कहा जाता है—

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अत्राद्येन मन्त्रेण सर्वैषणापरित्यागेन ज्ञाननिष्ठोक्ता प्रथमो वेदार्थः “ईशा वास्यमिदं सर्वं········ मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” इति । अज्ञानां जिजीविषूणां ज्ञाननिष्ठासम्भवे “कुर्वन्नेवेह कर्माणि···· जिजीविषेत्” इति कर्मनिष्ठोक्ता द्वितीयो वेदार्थः ।

अनयोश्च निष्ठयोर्विभागो अज्ञानां मन्त्रप्रदर्शितयोर्बृहदारण्यकेकर्मनिष्ठा ऽपि प्रदर्शितः “सोऽकामयत जाया मे स्यात्” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इत्यादिना अज्ञस्य कामिनः कर्माणीति । “मन एवास्यात्मा वाग्जाया” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इत्यादिवचनाद् अज्ञत्वं कामित्वं च कर्मनिष्ठस्य निश्चितमवगम्यते । तथा च तत्फलं सप्तान्नसर्गस्तेष्वात्मभावेनात्मस्वरूपावस्थानम् ।

जायाद्येषणात्रयसंन्यासेन च ज्ञानिनां आत्मविदां कर्मनिष्ठा-सांख्यनिष्ठा प्रातिकूल्येनात्मस्वरूपनिष्ठैव दर्शिता “किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः” (बृ० उ० ४ । ४ । २२) इत्यादिना । ये तु ज्ञाननिष्ठाः संन्यासिनस्तेभ्योऽसुर्या नाम त इत्यादिना अविद्वन्निन्दाद्वारेण आत्मनो याथात्म्यं स पर्यगाद् इत्येतदन्तैर्मन्त्रैरुपदिष्टम् । ते ह्यत्राधिकृता न कामिन इति । तथा च श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषदि “अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसङ्घजुष्टम्” (श्वे० उ० ६ । २१) इत्यादि विभज्योक्तम् ।

ये तु कर्मिणः कर्मनिष्ठाः कर्म कुर्वन्त एव जिजीविषवस्तेभ्य इदमुच्यते—