ततो भूय इव ते तमो य उविद्यायां रताः ॥ ९ ॥
andhaṃ tamaḥ praviśanti ye’vidyām upāsate .
tato bhūya iva te tamo ya uvidyāyāṃ ratāḥ .. 9 ..
पूर्व०—यह कैसे ज्ञात होता है कि [यह विधि कर्मनिष्ठों के ही लिये है] सबके लिये नहीं है?
सिद्धान्ती—बतलाते हैं, [सुनो] निष्काम पुरुष के लिये जो ‘यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ’ इस मन्त्र से साध्य और साधन के भेद का निराकरण करते हुए आत्मा के एकत्व का ज्ञान प्रतिपादन किया है, उसे कोई भी विचारवान् किसी भी कर्म या अन्य ज्ञान के साथ मिलाना नहीं चाहेगा । यहाँ तो समुच्चय की इच्छा से ही अविद्वान् आदि की निन्दा की है । अतः न्याय और शास्त्र के अनुसार जिसका जिसके साथ समुच्चय हो सकता है, वही यहाँ कहा गया है । सो कर्म के सम्बन्धीरूप से यहाँ दैव वित्त अर्थात् देवतासम्बन्धी ज्ञान का ही उल्लेख हुआ है—परमात्मज्ञान का नहीं; क्योंकि “विद्या से देवलोक प्राप्त होता है” [ऐसा इस ज्ञान का आत्मज्ञान से] पृथक् फल सुना गया है । उन ज्ञान और कर्म में से, यहाँ जो एक-एक के अनुष्ठान की निन्दा की है, वह समुच्चय के अभिप्राय से है, निन्दा के ही लिये नहीं; क्योंकि “उस पद पर विद्या (देवताज्ञान)-से आरूढ़ होते हैं” “विद्या से देवलोक की प्राप्ति होती है” “वहाँ दक्षिणमार्ग से जाने वाले नहीं पहुँचते” “कर्म से पितृलोक मिलता है” इत्यादि एक-एक का पृथक् फल बतलाने वाली श्रुतियाँ भी मिलती हैं; और शास्त्रविहित कोई भी बात अकर्तव्य नहीं हो सकती ।
उनमें वे तो अज्ञानरूप अन्धकार में प्रवेश करते हैं । कौन? जो अविद्या—विद्या से अन्य अविद्या अर्थात् कर्म यानी केवल अग्निहोत्रादिरूप अविद्या ही की उपासना करते हैं, अर्थात् तत्पर होकर कर्म का ही अनुष्ठान करते रहते हैं; क्योंकि कर्म विद्या (आत्मज्ञान)-के विरोधी हैं [इसलिये उन्हें अविद्या कहा गया है] । तथा उस अन्धकार से भी कहीं अधिक अन्धकार में वे प्रवेश करते हैं, कौन? जो कर्म करना छोड़कर केवल विद्या यानी देवताज्ञान में ही रत—अनुरक्त हैं । विद्या और कर्म के अवान्तर फल-भेद को ही इसके समुच्चय का कारण बतलाते हैं; नहीं तो एक-दूसरे के समीप हुए फलयुक्त और फलहीन परस्पर अंग और अंगी हो जायँगे [अर्थात् फलयुक्त तो अंगी (मुख्य) हो जायगा तथा फलहीन अंग (गौण) समझा जायगा] यही इसका अभिप्राय है ॥ ९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
कथं पुनरेवमवगम्यते न तु सर्वेषाम् इति ।
उच्यते—अकामिनः साध्यसाधनभेदोपमर्देन ‘यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः’ इति यदात्मैकत्वविज्ञानम् [उक्तम्] तन्न केनचित्कर्मणा ज्ञानान्तरेण वा ह्यमूढः समुच्चिचीषति । इह तु समुच्चिचीषया अविद्वदादिनिन्दा क्रियते । तत्र च यस्य येन समुच्चयः सम्भवति न्यायतः शास्त्रतो वा तदिहोच्यते यद्दैवं वित्तं देवताविषयं ज्ञानं कर्म सम्बन्धित्वेनोपन्यस्तं न परमात्मज्ञानम् । “विद्यया देवलोकः” (बृ० उ० १ । ५ । १६) इति पृथक्फलश्रवणात् । तयोर्ज्ञानकर्मणोरिह एकैकानुष्ठाननिन्दा समुच्चिचीषया न निन्दापरैव एकैकस्य पृथक्फलश्रवणात्; “विद्यया तदारोहन्ति” “विद्यया देवलोकः” (बृ० उ० १ । ५ । १६) “न तत्र दक्षिणा यन्ति” “कर्मणा पितृलोकः” (बृ० उ० १ । ५ । १६) इति । न हि शास्त्रविहितं किञ्चिदकर्तव्यतामियात् ।
तत्र अन्धतमोऽदर्शनात्मकं तमः प्रविशन्ति । के? येऽविद्यां विद्याया अन्या अविद्या तां कर्म इत्यर्थः, कर्मणो विद्याविरोधित्वात्; तामविद्यामग्निहोत्रादिलक्षणामेव केवलामुपासते तत्पराः सन्तोऽनुतिष्ठन्तीत्यभिप्रायः । ततस्तस्मादन्धात्मकात्तमसो भूय इव बहुतरमेव ते तमः प्रविशन्ति, के? कर्म हित्वा ये उ ये तु विद्यायामेव देवताज्ञान एव रता अभिरताः । तत्रावान्तरफलभेदं विद्याकर्मणोः समुच्चयकारणमाह; अन्यथा फलवदफलवतोः सन्निहितयोरङ्गाङ्गितैव स्याद् इत्यर्थः ॥ ९ ॥