नम्र-निवेदन
विषय की दृष्टि से वेदों के तीन विभाग हैं—कर्म, उपासना और ज्ञान । विश्व के कारणतत्त्व परब्रह्म का विचार ज्ञानकाण्ड में किया गया है । कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड का लक्ष्य मानव-मन में उस परमतत्त्व को उपलब्ध करने के लिये योग्यता का निर्माण करना है । इसलिये कर्म और उपासना साधन हैं और ज्ञान साध्य । वेद के इस ज्ञानकाण्ड का नाम ही उपनिषद् है और इसी को ब्रह्मविद्या का आदिस्रोत कहते हैं । उपनिषदों का मुख्य उद्देश्य ब्रह्म अथवा आत्मा के यथार्थ स्वरूप का बोध कराना है ।
उपनिषदें साक्षात् कामधेनु हैं । ब्रह्मसूत्रों की रचना इन्हीं के वाक्यों और शब्दों की संगति लगाने के उद्देश्य से हुई है और भगवद्गीता तो इन्हीं उपनिषदरूपी कामधेनु का अमृतमय पय है । उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीता को ही प्रस्थानत्रयी कहा जाता है । भारतवर्ष में प्रचलित जितने भी आस्तिक सम्प्रदाय हैं, उन सबके आधार यही तीनों ग्रन्थ हैं । अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत आदि सभी सम्प्रदायाचार्यों ने इस प्रस्थानत्रयी पर अपनी टीका लिखकर उसके द्वारा अपने सिद्धान्तों की पुष्टि की है । यद्यपि अपने-अपने स्थान पर सभी आचार्यों के भाष्य की उपादेयता है, किन्तु अद्वैत वेदान्त का प्रतिपादक भगवान् श्रीशङ्कराचार्य का उपनिषद्-भाष्य विचारकों के द्वारा सर्वोपरि माना जाता है ।
पाठकों की सुविधा की दृष्टि से प्रस्तुत पुस्तक में अलग-अलग खण्डों में पूर्व प्रकाशित ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय और श्वेताश्वतर-उपनिषद् के मन्त्र, मन्त्रानुवाद, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थ को एक साथ प्रकाशित किया गया है । इस प्रकार ब्रह्मविद्या के जिज्ञासु साधकों एवं पाठकों को नौ प्रमुख उपनिषदों के शाङ्करभाष्य एक साथ उपलब्ध हो गये हैं । आशा है पाठकगण ‘नौ उपनिषदों’ के इस संग्रह को अपनाकर लाभान्वित होंगे ।
- प्रकाशक
ॐ
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
ईशावास्येन सम्बोध्यमीश्वरं तं नमाम्यहम् ॥
शान्तिपाठ
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
सम्बन्ध-भाष्य
‘ईशा वास्यम्’ आदि मन्त्रों का कर्म में विनियोग नहीं है; क्योंकि वे आत्मा के यथार्थ स्वरूप का प्रतिपादन करनेवाले हैं जो कि कर्म का शेष नहीं है । आत्मा का यथार्थ स्वरूप शुद्धत्व, निष्पापत्व, एकत्व, नित्यत्व, अशरीरत्व और सर्वगतत्व आदि है जो आगे कहा जानेवाला है । इसका कर्म से विरोध है; अतः इन मन्त्रों का कर्म में विनियोग न होना ठीक ही है ।
आत्मा का ऐसे लक्षणोंवाला यथार्थ स्वरूप उत्पाद्य[ १ ], विकार्य[ २ ], आप्य[ ३ ] और संस्कार्य[ ४ ] अथवा कर्ता-भोक्तारूप नहीं है, जिससे कि वह कर्म का शेष हो सके । सम्पूर्ण उपनिषदों की परिसमाप्ति आत्मा के यथार्थ स्वरूप का निरूपण करने में ही होती है तथा गीता और मोक्षधर्मों का भी इसी में तात्पर्य है । अतः आत्मा के सामान्य लोगों की बुद्धि से सिद्ध होनेवाले अनेकत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व तथा अशुद्धत्व और पापमयत्व को लेकर ही कर्मों का विधान किया गया है ।
[ १ ]: उत्पन्न किया जानेयोग्य, जैसे पुरोडाश आदि ।
[ २ ]: विकारयोग्य, जैसे सोम आदि ।
[ ३ ]: बलवान् करने अथवा प्राप्त करनेयोग्य, जैसे मन्त्रादि ।
[ ४ ]: संस्कारयोग्य, जैसे व्रीहि आदि कर्म के शेषभूत पदार्थों में इन धर्मों का रहना आवश्यक है । आत्मा में ऐसा कोई धर्म नहीं है । इसलिये वह कर्म शेष नहीं हो सकता ।
कर्माधिकार के ज्ञाताओं का भी यही कथन है कि जो पुरुष ब्रह्मतेज आदि दृष्ट और स्वर्ग आदि अदृष्ट कर्मफलों का इच्छुक है और ‘मैं द्विजाति हूँ तथा कर्म के अनधिकारसूचक कानेपन, कुबड़ेपन आदि धर्मों से युक्त नहीं हूँ’ ऐसा अपने को मानता है, वही कर्म का अधिकारी है ।
अतः ये मन्त्र आत्मा के यथार्थ स्वरूप का प्रकाश करके आत्मसम्बन्धी स्वाभाविक अज्ञान को निवृत्त करते हुए संसार के शोकमोहादि धर्मों के विच्छेद के साधनस्वरूप आत्मैकत्वादि विज्ञान को ही उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार जिनके [मुमुक्षुरूप] अधिकारी, [आत्मैक्यरूप] विषय, [प्रतिपाद्य-प्रतिपादकरूप] सम्बन्ध और [अज्ञाननिवृत्ति तथा परमानन्दप्राप्तिरूप] प्रयोजन का ऊपर उल्लेख हो चुका है, उन मन्त्रों की अब हम संक्षेप से व्याख्या करेंगे ।
तात्पर्य पढ़ें
ईशा वास्यमित्यादयो मन्त्राः ईशादिकर्मस्वविनियुक्ताः । मन्त्राणां तेषामकर्मशेषस्यात्मनो विनियोगः याथात्म्यप्रकाशकत्वात् । याथात्म्यं चात्मनः शुद्धत्वापापविद्धत्वैकत्वनित्यत्वाशरीरत्वसर्वगतत्वादि वक्ष्यमाणम् । तच्च कर्मणा विरुध्येतेति युक्त एवैषां कर्मस्वविनियोगः ।
न ह्येवंलक्षणमात्मनो याथात्म्यमुत्पाद्यं विकार्यमाप्यं संस्कार्यं कर्तृभोक्तृरूपं वा येन कर्मशेषता स्यात् । सर्वासामुपनिषदामात्मयाथात्म्यनिरूपणेनैव उपक्षयात् । गीतानां मोक्षधर्माणां चैवंपरत्वात् । तस्मादात्मनोऽनेकत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वादि चाशुद्धत्वपापविद्धत्वादि चोपादाय लोकबुद्धिसिद्धं कर्माणि विहितानि ।
यो हि कर्मफलेनार्थी दृष्टेन कर्मणि ब्रह्मवर्चसादिनादृष्टेन कस्य स्वर्गादिना च द्विजातिअधिकारः रहं न काणकुब्जत्वाद्यनधिकारप्रयोजकधर्मवानित्यात्मानं मन्यते सोऽधिक्रियते कर्मस्विति ह्यधिकारविदो वदन्ति ।
तस्मादेते मन्त्रा आत्मनो अनुबन्ध- याथात्म्यप्रकाशनेन चतुष्टयम् आत्मविषयं स्वाभाविकमज्ञानं निवर्तयन्तः शोकमोहादिसंसारधर्मविच्छित्तिसाधनमात्मैकत्वादिविज्ञानमुत्पादयन्ति । इत्येवमुक्ताधिकार्यभिधेयसम्बन्धप्रयोजनान्मन्त्रान्संक्षेपतो व्याख्यास्यामः ।