भूमिका

सम्बन्ध-भाष्य

‘ईशा वास्यम्’ आदि मन्त्रों का कर्म में विनियोग नहीं है; क्योंकि वे आत्मा के यथार्थ स्वरूप का प्रतिपादन करनेवाले हैं जो कि कर्म का शेष नहीं है । आत्मा का यथार्थ स्वरूप शुद्धत्व, निष्पापत्व, एकत्व, नित्यत्व, अशरीरत्व और सर्वगतत्व आदि है जो आगे कहा जानेवाला है । इसका कर्म से विरोध है; अतः इन मन्त्रों का कर्म में विनियोग न होना ठीक ही है ।

आत्मा का ऐसे लक्षणोंवाला यथार्थ स्वरूप उत्पाद्य, विकार्य, आप्य और संस्कार्य अथवा कर्ता-भोक्तारूप नहीं है, जिससे कि वह कर्म का शेष हो सके । सम्पूर्ण उपनिषदों की परिसमाप्ति आत्मा के यथार्थ स्वरूप का निरूपण करने में ही होती है तथा गीता और मोक्षधर्मों का भी इसी में तात्पर्य है । अतः आत्मा के सामान्य लोगों की बुद्धि से सिद्ध होनेवाले अनेकत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व तथा अशुद्धत्व और पापमयत्व को लेकर ही कर्मों का विधान किया गया है ।

कर्माधिकार के ज्ञाताओं का भी यही कथन है कि जो पुरुष ब्रह्मतेज आदि दृष्ट और स्वर्ग आदि अदृष्ट कर्मफलों का इच्छुक है और ‘मैं द्विजाति हूँ तथा कर्म के अनधिकारसूचक कानेपन, कुबड़ेपन आदि धर्मों से युक्त नहीं हूँ’ ऐसा अपने को मानता है, वही कर्म का अधिकारी है ।

अतः ये मन्त्र आत्मा के यथार्थ स्वरूप का प्रकाश करके आत्मसम्बन्धी स्वाभाविक अज्ञान को निवृत्त करते हुए संसार के शोकमोहादि धर्मों के विच्छेद के साधनस्वरूप आत्मैकत्वादि विज्ञान को ही उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार जिनके [मुमुक्षुरूप] अधिकारी, [आत्मैक्यरूप] विषय, [प्रतिपाद्य-प्रतिपादकरूप] सम्बन्ध और [अज्ञाननिवृत्ति तथा परमानन्दप्राप्तिरूप] प्रयोजन का ऊपर उल्लेख हो चुका है, उन मन्त्रों की अब हम संक्षेप से व्याख्या करेंगे ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ईशा वास्यमित्यादयो मन्त्राः ईशादिकर्मस्वविनियुक्ताः । मन्त्राणां तेषामकर्मशेषस्यात्मनो विनियोगः याथात्म्यप्रकाशकत्वात् । याथात्म्यं चात्मनः शुद्धत्वापापविद्धत्वैकत्वनित्यत्वाशरीरत्वसर्वगतत्वादि वक्ष्यमाणम् । तच्च कर्मणा विरुध्यतेति युक्त एवैषां कर्मस्वविनियोगः ।

न ह्येवंलक्षणमात्मनो याथात्म्यमुत्पाद्यं विकार्यमाप्यं संस्कार्यं कर्तृभोक्तृरूपं वा येन कर्मशेषता स्यात् । सर्वासामुपनिषदामात्मयाथात्म्यनिरूपणेनैव उपक्षयात् । गीतानां मोक्षधर्माणां चैवंपरत्वात् । तस्मादात्मनोऽनेकत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वादि चाशुद्धत्वपापविद्धत्वादि चोपादाय लोकबुद्धिसिद्धं कर्माणि विहितानि ।

यो हि कर्मफलेनार्थी दृष्टेन कर्मणि ब्रह्मवर्चसादिनादृष्टेन कस्य स्वर्गादिना च द्विजातिअधिकारः रहं न काणकुब्जत्वाद्यनधिकारप्रयोजकधर्मवानित्यात्मानं मन्यते सोऽधिक्रियते कर्मस्विति ह्यधिकारविदो वदन्ति ।

तस्मादेते मन्त्रा आत्मनो अनुबन्ध- याथात्म्यप्रकाशनेन चतुष्टयम् आत्मविषयं स्वाभाविकमज्ञानं निवर्तयन्तः शोकमोहादिसंसारधर्मविच्छित्तिसाधनमात्मैकत्वादिविज्ञानमुत्पादयन्ति । इत्येवमुक्ताधिकार्यभिधेयसम्बन्धप्रयोजनान्मन्त्रान्संक्षेपतो व्याख्यास्यामः ।