यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखग्ँरात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥
सुखग्ँरात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥
yathā purastādbhavitā pratīta auddālakirāruṇirmatprasṛṣṭaḥ .
sukhag̐rātrīḥ śayitā vītamanyustvāṃ dadṛśivānmṛtyumukhātpramuktam .. 11 ..
मुझसे प्रेरित होकर अरुणपुत्र उद्दालक तुझे पूर्ववत् पहचान लेगा । और शेष रात्रियों में सुखपूर्वक सोवेगा, क्योंकि तुझे मृत्यु के मुख से छूटकर आया हुआ देखेगा ॥ ११ ॥
तेरे पिता की बुद्धि जिस प्रकार पहले तेरे प्रति स्नेहयुक्ता थी उसी प्रकार वह औद्दालकि अब भी प्रीतियुक्त होकर तेरे प्रति विश्वस्त हो जायगा । यहाँ उद्दालक को ही ‘औद्दालकि’ कहा है तथा अरुण का पुत्र होने से वह आरुणि है । अथवा यह भी हो सकता है कि वह द्व्यामुष्यायण* हो । मत्प्रसृष्टः अर्थात् मुझसे आज्ञप्त होकर वह शेष रात्रियों में भी सुखपूर्वक यानी प्रसन्न चित्त से शयन करेगा तथा [यह सोचकर] वीतमन्यु—क्रोधहीन हो जायगा कि तुझ पुत्र को मृत्यु के मुख से अर्थात् मृत्यु के अधिकार से मुक्त हुआ देखा है ॥ ११ ॥
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यथा बुद्धिस्त्वयि पुरस्तात् पूर्वमासीत्स्नेहसमन्विता पितुस्तव भविता प्रीतिसमन्वितस्तव पिता तथैव प्रतीतवान्सन्नौद्दालकिः उद्दालक एवौद्दालकिः । अरुणस्यापत्यमारुणिः, द्व्यामुष्यायणो वा । मत्प्रसृष्टो मयानुज्ञातः सन् इतरा अपि रात्रीः सुखं प्रसन्नमनाः शयिता स्वप्ता वीतमन्युर्विगतमन्युश्च भविता स्यात्त्वा पुत्रं ददृशिवान्दृष्टवान्सन् मृत्युमुखान्मृत्युगोचरात् प्रमुक्तं सन्तम् ॥ ११ ॥
नचिकेता बोला—
> [ * ]: जो एक ही पुत्र दो पिताओं द्वारा संकेत करके अपना उत्तराधिकारी निश्चित किया जाता है वह ‘द्व्यामुष्यायण’ कहलाता है । वह अकेला ही दोनों पिताओं की सम्पत्ति का स्वामी और उन्हें पिण्डदान करने का अधिकारी होता है । जैसे पुत्ररूप से स्वीकार किया हुआ पुत्री का पुत्र अथवा अन्य दत्तक पुत्र आदि । अतः अकेले वाजश्रवस को ही औद्दालकि और आरुणि कहने से यह सम्भव है कि वह उद्दालक और अरुण दो पिताओं का उत्तराधिकारी हो ।
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नचिकेता उवाच—