स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।
उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥
उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥
svarge loke na bhayaṃ kiṃcanāsti na tatra tvaṃ na jarayā bibheti .
ubhe tīrtvāśanāyāpipāse śokātigo modate svargaloke .. 12 ..
हे मृत्युदेव! स्वर्गलोक में कुछ भी भय नहीं है । वहाँ आपका भी वश नहीं चलता । वहाँ कोई वृद्धावस्था से भी नहीं डरता । स्वर्गलोक में पुरुष भूख-प्यास—दोनों को पार करके शोक से ऊपर उठकर आनन्दित होता है ॥ १२ ॥
स्वर्गलोक में रोगादि के कारण होनेवाला भय तनिक भी नहीं है । हे मृत्यो! वहाँ आपकी भी सहसा दाल नहीं गलती । अतः इस लोक के समान वहाँ वृद्धावस्था से युक्त होकर कोई पुरुष आपसे कहीं नहीं डरता । बल्कि पुरुष भूख-प्यास दोनों को पार करके, जो शोक को अतिक्रमण कर जाय ऐसा शोकातीत होकर मानसिक दुःख से छुटकारा पाकर उस दिव्य स्वर्गलोक में आनन्दित होता है ॥ १२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स्वर्गे लोके रोगादिनिमित्तं भयं किंचन किंचिदपि नास्ति । न च तत्र त्वं मृत्यो सहसा प्रभवस्यतो जरया युक्त इह लोकवत्त्वत्तो न बिभेति कुतश्चित् तत्र । किंचोभे अशनायापिपासे तीर्त्वातिक्रम्य शोकमतीत्य गच्छतीति शोकातिगः सन् मानसेन दुःखेन वर्जितो मोदते हृष्यति स्वर्गलोके दिव्ये ॥ १२ ॥