अध्याय 1 वल्ली 1 - मन्त्र 3

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥ ३ ॥

pītodakā jagdhatṛṇā dugdhadohā nirindriyāḥ .
anandā nāma te lokāstānsa gacchati tā dadat .. 3 ..


जो जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो चुका है, जिनका दूध भी दुह लिया गया है और जिनमें प्रजननशक्ति का भी अभाव हो गया है उन गौओं का दान करने से वह दाता, जो अनन्द (आनन्दशून्य)-लोक हैं उन्हीं को जाता है ॥ ३ ॥
दक्षिणा के लिये लायी हुई गौओं का विशेषण बतलाते हैं; जिन्होंने जल पी लिया है वे पीतोदका कहलाती हैं, जो तृण (घास) खा चुकी हैं [अर्थात् जिनमें और घास खाने की शक्ति नहीं रही है] वे जग्धतृणा हैं, जिनका क्षीर नामक दोह दुहा जा चुका है वे दुग्धदोहा हैं तथा निरिन्द्रिया — जो सन्तान उत्पन्न करने में असमर्था अर्थात् बूढ़ी और निष्फल गौएँ हैं उन इस प्रकार की गौओं को दक्षिणा-बुद्धि से देनेवाला यजमान जो अनन्द अर्थात् सुखहीन लोक हैं उन्हीं को जाता है ॥ ३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
दक्षिणार्था गावो विशेष्यन्ते । पीतमुदकं याभिस्ताः पीतोदकाः, जग्धं भक्षितं तृणं याभिस्ता जग्धतृणाः, दुग्धो दोहः क्षीराख्यो यासां ता दुग्धदोहाः, निरिन्द्रिया अप्रजननसमर्था जीर्णा निष्फला गाव इत्यर्थः । यास्ता एवंभूता गा ऋत्विग्भ्यो दक्षिणाबुद्ध्या ददत्प्रयच्छन्ननन्दा अनानन्दा असुखा नामेत्येतद्ये ते लोकास्तान्स यजमानो गच्छति ॥ ३ ॥