अध्याय 1 वल्ली 1 - मन्त्र 4

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति ।
द्वितीयं तृतीयं तग्ँ होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥

sa hovāca pitaraṃ tata kasmai māṃ dāsyasīti .
dvitīyaṃ tṛtīyaṃ tag̐ hovāca mṛtyave tvā dadāmīti .. 4 ..


तब वह अपने पिता से बोला — ‘हे तात! आप मुझे किसको देंगे? ’ इसी प्रकार उसने दुबारा-तिबारा भी कहा । तब पिता ने उससे ‘मैं तुझे मृत्यु को दूँगा’ ऐसा कहा ॥ ४ ॥

तब, इस प्रकार यज्ञ की पूर्णता न होने के कारण पिता को प्राप्त होनेवाला अनिष्ट फल मुझ-जैसे सत्पुत्र को आत्म-बलिदान करके भी निवृत्त करना चाहिये — ऐसा मानकर वह पिता के समीप जाकर बोला — ‘हे तात! आप मुझे किस ऋत्विग्विशेष को दक्षिणा में देंगे? ’

इस प्रकार कहने पर पिता द्वारा बारम्बार उपेक्षा किये जाने पर भी उसने दूसरे-तीसरे बार भी यही बात कही कि ‘मुझे किसको देंगे? मुझे किसको देंगे? ’ तब पिता यह सोचकर कि यह बालकों के-से स्वभाववाला नहीं है, क्रोधित हो गया और उस पुत्र से बोला — ‘मैं तुझे सूर्य के पुत्र मृत्यु को देता हूँ’ ॥ ४ ॥

तात्पर्य पढ़ें
तदेवं क्रत्वसम्पत्तिनिमित्तं पितुरनिष्टं फलं मया पुत्रेण सता निवारणीयमात्मप्रदानेनापि क्रतुसम्पत्तिं कृत्वेत्येवं मत्वा पितरम् उपगम्य स होवाच पितरं हे तत तात कस्मै ऋत्विग्विशेषाय दक्षिणार्थं मां दास्यसि प्रयच्छसि इत्येतत् । एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्यमाणोऽपि द्वितीयं तृतीयमप्युवाच कस्मै मां दास्यसि कस्मै मां दास्यसीति । नायं कुमारस्वभाव इति क्रुद्धः सन्पिता तं ह पुत्रं किलोवाच मृत्यवे वैवस्वताय त्वा त्वां ददामीति ॥ ४ ॥

पिता द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह पुत्र एकान्त में अनुताप करने लगा, किस प्रकार? सो बतलाते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
स एवमुक्तः पुत्र एकान्ते परिदेवयाञ्चकार । कथम्? इत्युच्यते—