बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।
किग्ँस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥
किग्ँस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥
bahūnāmemi prathamo bahūnāmemi madhyamaḥ .
kig̐svidyamasya kartavyaṃ yanmayādya kariṣyati .. 5 ..
मैं बहुत-से [शिष्य या पुत्रों]-में तो प्रथम (मुख्य वृत्ति से) चलता हूँ और बहुतों में मध्यम (मध्यम वृत्ति से) जाता हूँ । यम का ऐसा क्या कार्य है जिसे पिता आज मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे ॥ ५ ॥
मैं बहुत-से शिष्य अथवा पुत्रों में तो प्रथम अर्थात् आगे रहकर मुख्य शिष्यादि वृत्ति से चलता हूँ तथा बहुत-से मध्यम शिष्यादि में मध्यम रहकर मध्यम-वृत्ति से बर्तता हूँ । अधम वृत्ति से मैं कभी नहीं रहता । उस ऐसे विशिष्टगुणसम्पन्न पुत्र को भी पिता ने ‘मैं तुझे मृत्यु को देता हूँ’ ऐसा कहा । परन्तु यम का ऐसा कौन-सा कर्तव्य—प्रयोजन इन्हें पूर्ण करना है जिसे ये इस प्रकार दिये हुए मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे? अवश्य किसी प्रयोजन की अपेक्षा न करके ही पिता ने क्रोधवश ऐसा कहा है । तथापि ‘पिता का वचन मिथ्या न हो’ ऐसा विचारकर उसने अपने पिता से, जो यह सोचकर कि ‘मैंने क्या कह डाला? ’ शोकातुर हो रहे थे, खेदपूर्वक कहा ॥ ५ ॥
तात्पर्य पढ़ें
बहूनां शिष्याणां पुत्राणां वैमि गच्छामि प्रथमः सन्मुख्या शिष्यादिवृत्त्येत्यर्थः । मध्यमानां च बहूनां मध्यमो मध्यमयैव वृत्त्येमि । नाधमया कदाचिदपि । तमेवं विशिष्टगुणमपि पुत्रं मां मृत्यवे त्वा ददामीत्युक्तवान् पिता । स किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं प्रयोजनं मया प्रत्तेन करिष्यति यत्कर्तव्यमद्य? नूनं प्रयोजनम् अनपेक्ष्यैव क्रोधवशादुक्तवान् पिता । तथापि तत्पितुर्वचो मृषा मा भूदित्येवं मत्वा परिदेवनापूर्वकमाह पितरं शोकाविष्टं किं मयोक्तमिति ॥ ५ ॥