अध्याय 1 वल्ली 1 - मन्त्र 8

आशाप्रतीक्षे संगतग्ँसूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूग्ँश्च सर्वान् ।
एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥

āśāpratīkṣe saṃgatag̐sūnṛtāṃ ca iṣṭāpūrte putrapaśūg̐śca sarvān .
etadvṛṅkte puruṣasyālpamedhaso yasyānaśnanvasati brāhmaṇo gṛhe .. 8 ..


जिसके घर में ब्राह्मण-अतिथि बिना भोजन किये रहता है उस मन्दबुद्धि पुरुष की ज्ञात और अज्ञात वस्तुओं की प्राप्ति की इच्छाएँ, उनके संयोग से प्राप्त होनेवाले फल, प्रिय वाणी से होनेवाले फल, यागादि इष्ट एवं उद्यानादि पूर्त कर्मों के फल तथा समस्त पुत्र और पशु आदि को वह नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥

जिसके घर में ब्राह्मण बिना भोजन किये रहता है उस मन्दमति पुरुष के ‘आशाप्रतीक्षा’—आशा—जिनका कोई ज्ञान नहीं है उन प्राप्तव्य इष्ट पदार्थों की इच्छा तथा अपने प्राप्तव्य ज्ञात पदार्थों की प्रतीक्षा एवं संगत—उनके संयोग से प्राप्त होनेवाले फल, सूनृता—प्रिय वाणी और उससे होनेवाले फल, ‘इष्टापूर्त’— इष्ट—यागादि से प्राप्त होनेवाले फल और पूर्त—बाग बगीचों के लगाने से होनेवाले फल तथा पुत्र और पशु—इन उपर्युक्त सभी को नष्ट कर देता है । अतः तात्पर्य यह है कि अतिथि सभी अवस्थाओं में अनुपेक्षणीय है ॥ ८ ॥

[मन्त्रियोंद्वारा] इस प्रकार कहे जाने पर यमराज ने नचिकेता के पास जा उसकी पूजा करने के अनन्तर कहा—

तात्पर्य पढ़ें

आशाप्रतीक्षे अनिर्ज्ञातप्राप्येष्टार्थअतिथ्युपेक्षणे प्रार्थना आशा दोषाः निर्ज्ञातप्राप्यार्थप्रतीक्षणं प्रतीक्षा ते आशाप्रतीक्षे, संगतं तत्संयोगजं फलम्, सूनृतां च सूनृता हि प्रिया वाक्तन्निमित्तं च, इष्टापूर्ते इष्टं यागजं पूर्तमारामादिक्रियाजं फलम्, पुत्रपशूंश्च पुत्रांश्च पशूंश्च सर्वानैतत्सर्वं यथोक्तं वृङ्क्ते आवर्जयति विनाशयतीत्येतत्—पुरुषस्याल्पमेधसोऽल्पप्रज्ञस्य—यस्यानश्नन्नभुञ्जानो ब्राह्मणो गृहे वसति । तस्मादनुपेक्षणीयः सर्वावस्थास्वप्यतिथिरित्यर्थः ॥ ८ ॥

एवमुक्तो मृत्युरुवाच नचिकेतसमुपगम्य पूजापुरःसरम्—