तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥
anyacchreyo’nyadutaiva preyaste ubhe nānārthe puruṣag̐sinītaḥ .
tayoḥ śreya ādadānasya sādhu bhavati hīyate’rthādya u preyo vṛṇīte .. 1 ..
श्रेय अर्थात् निःश्रेयस अन्यत्—भिन्न ही है तथा प्रेय यानी प्रियतर वस्तु भी अन्य ही है । वे श्रेय और प्रेय दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले होने पर भी अधिकारी यानी वर्णाश्रमादिविशिष्ट पुरुष का बन्धन कर देते हैं; अर्थात् सब लोग उन्हीं के द्वारा अपने [विद्या-अविद्या-सम्बन्धी] कर्तव्य से युक्त हो जाते हैं । अभ्युदय की इच्छावाला पुरुष प्रेय से और अमृतत्व का इच्छुक श्रेय से प्रवृत्त होता है । अतः श्रेय और प्रेय इन दोनों के प्रयोजनों की कर्तव्यता के कारण सब लोग उनसे बद्ध कहे जाते हैं ।
वे यद्यपि एक-एक पुरुषार्थ से सम्बन्ध रखनेवाले हैं तो भी विद्या और अविद्यारूप होने के कारण परस्पर विरुद्ध हैं, अतः एक का परित्याग किये बिना एक पुरुष द्वारा उन दोनों का साथ-साथ अनुष्ठान न हो सकने के कारण उनमें से अविद्यारूप प्रेय को छोड़कर केवल श्रेय को ही स्वीकार करनेवाले का साधु—शुभ यानी कल्याण होता है । जो मूढ दूरदर्शी नहीं है वह इस अर्थ—पुरुषार्थ अर्थात् परमार्थसम्बन्धी नित्य प्रयोजन से च्युत हो जाता है; वह कौन है? वही जो कि प्रेय को वरण करता है—यह इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥
तात्पर्य पढ़ें
अन्यत्पृथगेव श्रेयो निःश्रेयसं तथान्यदुताप्येव प्रेयः प्रियतरमपि । ते प्रेयःश्रेयसी उभे नानार्थे भिन्नप्रयोजने सती पुरुषमधिकृतं वर्णाश्रमादिविशिष्टं सिनीतो बध्नीतस्ताभ्यामात्मकर्तव्यतया प्रयुज्यते सर्वः पुरुषः । श्रेयःप्रेयसोर्ह्यभ्युदयामृतत्वार्थी पुरुषः प्रवर्तते । अतः श्रेयःप्रेयःप्रयोजनकर्तव्यतया ताभ्यां बद्ध इत्युच्यते सर्वः पुरुषः ।
ते यद्यप्येकपुरुषार्थ सम्बन्धिनी विद्याविद्यारूपत्वाद्विरुद्धे इत्यन्यतरापरित्यागेनैकेन पुरुषेण सहानुष्ठातुमशक्यत्वात् तयोर्हित्वाविद्यारूपं प्रेयः श्रेय एव केवलमाददानस्योपादानं कुर्वतः साधु शोभनं शिवं भवति । यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते वियुज्यतेऽस्मादर्थात् पुरुषार्थात् पारमार्थिकात्प्रयोजनान्नित्यात् प्रच्यवत इत्यर्थः । कोऽसौ य उ प्रेयो वृणीत उपादत्त इत्येतत् ॥ १ ॥