अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 1

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषग्ँसिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥

anyacchreyo’nyadutaiva preyaste ubhe nānārthe puruṣag̐sinītaḥ .
tayoḥ śreya ādadānasya sādhu bhavati hīyate’rthādya u preyo vṛṇīte .. 1 ..


श्रेय (विद्या) और है तथा प्रेय (अविद्या) और ही है । वे दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले होते हुए ही पुरुष को बाँधते हैं । उन दोनों में से श्रेय को ग्रहण करनेवाले का शुभ होता है और जो प्रेय को वरण करता है वह पुरुषार्थ से पतित हो जाता है ॥ १ ॥

श्रेय अर्थात् निःश्रेयस अन्यत्—भिन्न ही है तथा प्रेय यानी प्रियतर वस्तु भी अन्य ही है । वे श्रेय और प्रेय दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले होने पर भी अधिकारी यानी वर्णाश्रमादिविशिष्ट पुरुष का बन्धन कर देते हैं; अर्थात् सब लोग उन्हीं के द्वारा अपने [विद्या-अविद्या-सम्बन्धी] कर्तव्य से युक्त हो जाते हैं । अभ्युदय की इच्छावाला पुरुष प्रेय से और अमृतत्व का इच्छुक श्रेय से प्रवृत्त होता है । अतः श्रेय और प्रेय इन दोनों के प्रयोजनों की कर्तव्यता के कारण सब लोग उनसे बद्ध कहे जाते हैं ।

वे यद्यपि एक-एक पुरुषार्थ से सम्बन्ध रखनेवाले हैं तो भी विद्या और अविद्यारूप होने के कारण परस्पर विरुद्ध हैं, अतः एक का परित्याग किये बिना एक पुरुष द्वारा उन दोनों का साथ-साथ अनुष्ठान न हो सकने के कारण उनमें से अविद्यारूप प्रेय को छोड़कर केवल श्रेय को ही स्वीकार करनेवाले का साधु—शुभ यानी कल्याण होता है । जो मूढ दूरदर्शी नहीं है वह इस अर्थ—पुरुषार्थ अर्थात् परमार्थसम्बन्धी नित्य प्रयोजन से च्युत हो जाता है; वह कौन है? वही जो कि प्रेय को वरण करता है—यह इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥

तात्पर्य पढ़ें

अन्यत्पृथगेव श्रेयो निःश्रेयसं तथान्यदुताप्येव प्रेयः प्रियतरमपि । ते प्रेयःश्रेयसी उभे नानार्थे भिन्नप्रयोजने सती पुरुषमधिकृतं वर्णाश्रमादिविशिष्टं सिनीतो बध्नीतस्ताभ्यामात्मकर्तव्यतया प्रयुज्यते सर्वः पुरुषः । श्रेयःप्रेयसोर्ह्यभ्युदयामृतत्वार्थी पुरुषः प्रवर्तते । अतः श्रेयःप्रेयःप्रयोजनकर्तव्यतया ताभ्यां बद्ध इत्युच्यते सर्वः पुरुषः ।

ते यद्यप्येकपुरुषार्थ सम्बन्धिनी विद्याविद्यारूपत्वाद्विरुद्धे इत्यन्यतरापरित्यागेनैकेन पुरुषेण सहानुष्ठातुमशक्यत्वात् तयोर्हित्वाविद्यारूपं प्रेयः श्रेय एव केवलमाददानस्योपादानं कुर्वतः साधु शोभनं शिवं भवति । यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते वियुज्यतेऽस्मादर्थात् पुरुषार्थात् पारमार्थिकात्प्रयोजनान्नित्यात् प्रच्यवत इत्यर्थः । कोऽसौ य उ प्रेयो वृणीत उपादत्त इत्येतत् ॥ १ ॥


यदि श्रेय और प्रेय इन दोनों ही का करना मनुष्य के स्वाधीन है तो लोग अधिकता से प्रेय को ही क्यों स्वीकार करते हैं? इसपर कहा जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
यद्युभे अपि कर्तुं स्वायत्ते पुरुषेण किमर्थं प्रेय एवादत्ते बाहुल्येन लोक इत्युच्यते—