ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥
jānāmyahaṃ śevadhirityanityaṃ na hyadhruvaiḥ prāpyate hi dhruvaṃ tat .
tato mayā nāciketaścito’gniranityairdravyaiḥ prāptavānasmi nityam .. 10 ..
जिसके लिये निधि (खजाने)-के समान प्रार्थना की जाती है वह कर्मफलरूप निधि ही ‘शेवधि’ है । यह अनित्य—सदा न रहनेवाली है—ऐसा मैं जानता हूँ । क्योंकि इन अनित्य यानी अस्थिर साधनों से वह परमात्मा नामक नित्य—स्थिर निधि प्राप्त नहीं की जा सकती । जो निधि अनित्यसुखस्वरूप है वही अनित्य पदार्थों से प्राप्त होती है ।
क्योंकि ऐसा है इसलिये मैंने यह जान-बूझकर भी कि ‘अनित्य साधनों से नित्य की प्राप्ति नहीं होती’ नाचिकेत अग्नि का चयन किया था; अर्थात् पशु आदि अनित्य पदार्थों से स्वर्ग-सुख के साधनस्वरूप उस अग्नि का सम्पादन किया था । उसी से मैं अधिकार-सम्पन्न होकर आपेक्षिक नित्य स्वर्ग नामक याम्यस्थान को प्राप्त हुआ हूँ ॥ १० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
जानाम्यहं शेवधिर्निधिः कर्मफललक्षणो निधिरिव प्रार्थ्यत इति । असावनित्यमनित्य इति जानामि । न हि यस्मादनित्यै- रध्रुवैर्नित्यं ध्रुवं तत्प्राप्यते परमात्माख्यः शेवधिः । यस्त्वनित्यसुखात्मकः शेवधिः स एवानित्यैर्द्रव्यैः प्राप्यते ।
हि यतस्ततस्तस्मान्मया जानतापि नित्यमनित्यसाधनैर्न प्राप्यत इति नाचिकेतश्चितोऽग्निः, अनित्यैर्द्रव्यैः पश्वादिभिः स्वर्गसुखसाधनभूतोऽग्निर्निर्वर्तित इत्यर्थः । तेनाहमधिकारापन्नो नित्यं याम्यं स्थानं स्वर्गाख्यं नित्यमापेक्षिकं प्राप्तवानस्मि ॥ १० ॥