कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् ।
स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥
स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥
kāmasyāptiṃ jagataḥ pratiṣṭhāṃ kratoranantyamabhayasya pāram .
stomamahadurugāyaṃ pratiṣṭhāṃ dṛṣṭvā dhṛtyā dhīro naciketo’tyasrākṣīḥ .. 11 ..
हे नचिकेतः! तूने बुद्धिमान् होकर भोगों की समाप्ति (अवधि), जगत् की प्रतिष्ठा, यज्ञफल के अनन्तत्व, अभय की मर्यादा, स्तुत्य और महती (अणिमादि ऐश्वर्ययुक्त) विस्तीर्ण गति तथा प्रतिष्ठा को देखकर भी उसे धैर्यपूर्वक त्याग दिया है ॥ ११ ॥
किन्तु ‘ हे नचिकेतः! तुमने तो धीर—धृतिमान् होकर कामनाओं की प्राप्ति—समाप्ति को, क्योंकि इस [हिरण्यगर्भ पद] - में ही सम्पूर्ण कामनाएँ समाप्त होती हैं, तथा सर्वात्मक होने के कारण अध्यात्म, अधिभूत एवं अधिदैवरूप जगत् की प्रतिष्ठा यानी आश्रय को, यज्ञ के अनन्त्य—आनन्त्य अर्थात् अनन्त फल हिरण्यगर्भ पद को, अभय के पार अर्थात् परा निष्ठा को और स्तोम—स्तुत्य तथा महत्—अणिमादि ऐश्वर्य आदिक अनेक गुणों के संघात से युक्त, इस प्रकार जो स्तोम है और महत् भी है ऐसे सर्वोत्कृष्ट होने के कारण स्तोममहत् उरुगाय—विस्तीर्ण गति को तथा प्रतिष्ठा—अपनी सर्वोत्तम स्थिति को देखकर भी उसे धैर्यपूर्वक त्याग दिया । अर्थात् एकमात्र परवस्तु की ही इच्छा करते हुए इस सम्पूर्ण सांसारिक भोगसमूह का परित्याग कर दिया । अहो! तुम बड़े ही उत्कृष्ट गुणसम्पन्न हो! ॥ ११ ॥
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त्वं तु कामस्याप्तिं समाप्तिम्, अत्रैवेहैव सर्वे कामाः परिसमाप्ताः, जगतः साध्यात्माधिभूताधिदैवादेः प्रतिष्ठामाश्रयं सर्वात्मकत्वात्, क्रतोः फलं हैरण्यगर्भं पदमनन्त्यमानन्त्यम्, अभयस्य च पारं परां निष्ठाम्, स्तोमं स्तुत्यं महदणिमाद्यैश्वर्याद्यनेकगुणसंहतं स्तोमं च तन्महच्च निरतिशयत्वात्स्तोममहत्, उरुगायं विस्तीर्णां गतिम्, प्रतिष्ठां स्थितिमात्मनोऽनुत्तमामपि दृष्ट्वा धृत्या धैर्येण धीरो धीमान्सन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः परमेव आकाङ्क्षन्नतिसृष्टवानसि सर्वम् एतत् संसारभोगजातम् । अहो बतानुत्तमगुणोऽसि ॥ ११ ॥
जिस आत्मा को तुम जानना चाहते हो—
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यं त्वं ज्ञातुमिच्छस्यात्मानम्—