अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥
taṃ durdarśaṃ gūḍhamanupraviṣṭaṃ guhāhitaṃ gahvareṣṭhaṃ purāṇam .
adhyātmayogādhigamena devaṃ matvā dhīro harṣaśokau jahāti .. 12 ..
अति सूक्ष्म होने के कारण दुर्दर्श—जिसका कठिनता से दर्शन हो सके उसे दुर्दर्श कहते हैं, गूढ़ अर्थात् गहन स्थान में अनुप्रविष्ट यानी शब्दादि प्राकृत विषयविकाररूप विज्ञान से छिपे हुए, गुहा—बुद्धि में उपलब्ध होने के कारण उसी में स्थित तथा गह्वरेष्ठ—गह्वर—विषम यानी अनेक अनर्थों से संकुलित स्थान में रहनेवाले [देव को जानकर धीर पुरुष हर्ष-शोक को त्याग देता है] । क्योंकि आत्मा इस प्रकार गूढ़ स्थान में अनुप्रविष्ट और बुद्धि में स्थित है इसलिये वह गह्वरेष्ठ है तथा गह्वरेष्ठ होने के कारण ही दुर्दर्श है ।
उस पुराण यानी पुरातन देव को अध्यात्मयोग की—चित्त को विषयों से हटाकर आत्मा में लगा देना अध्यात्मयोग है, उसकी प्राप्तिद्वारा जानकर धीर पुरुष अपने उत्कर्ष-अपकर्ष का अभाव हो जाने के कारण हर्ष-शोक का परित्याग कर देता है ॥ १२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तं दुर्दर्शं दुःखेन दर्शनम् अस्येति दुर्दर्शोऽतिसूक्ष्मत्वात्, गूढं गहनमनुप्रविष्टं प्राकृतविषयविकारविज्ञानैः प्रच्छन्नमित्येतत्, गुहाहितं गुहायां बुद्धौ स्थितं तत्रोपलभ्यमानत्वात्, गह्वरेष्ठं गह्वरे विषमेऽनेकानर्थसंकटे तिष्ठतीति गह्वरेष्ठम् । यत एवं गूढमनुप्रविष्टो गुहाहितश्चातो गह्वरेष्ठः, अतो दुर्दर्शः ।
तं पुराणं पुरातनमध्यात्मयोगाधिगमेन विषयेभ्यः प्रतिसंहृत्य चेतस आत्मनि समाधानम् अध्यात्मयोगस्तस्याधिगमस्तेन मत्वा देवमात्मानं धीरो हर्षशोकावात्मन उत्कर्षापकर्षयोः अभावाज्जहाति ॥ १२ ॥