एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।
स मोदते मोदनीयग्ँ हि लब्ध्वा विवृतग्ँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥
स मोदते मोदनीयग्ँ हि लब्ध्वा विवृतग्ँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥
etacchrutvā saṃparigṛhya martyaḥ pravṛhya dharmyamaṇumetamāpya .
sa modate modanīyag̐ hi labdhvā vivṛtag̐ sadma naciketasaṃ manye .. 13 ..
मनुष्य इस आत्मतत्त्व को सुनकर और उसे भली प्रकार ग्रहणकर धर्मी आत्मा को देहादि संघात से पृथक् करके इस सूक्ष्म आत्मा को पाकर तथा इस मोदनीय की उपलब्धि कर अति आनन्दित हो जाता है । मैं [तुझ] नचिकेता को खुले हुए ब्रह्मभवनवाला समझता हूँ, [अर्थात् हे नचिकेतः! मेरे विचार से तेरे लिये मोक्ष का द्वार खुला हुआ है] ॥ १३ ॥
इस आत्मतत्त्व को, जिसका कि अब मैं वर्णन करूँगा, उसे सुनकर—आचार्य की कृपा से भली प्रकार आत्मभाव से ग्रहण कर मरणधर्मा मनुष्य इस धर्म्य—धर्मविशिष्ट आत्मा को शरीरादि से उद्यमन करके यानी पृथक् करके तथा इस अणु अर्थात् सूक्ष्म और मोदनीय—हर्षयोग्य आत्मा को उपलब्ध कर वह मरणशील विद्वान् आनन्दित हो जाता है । इस प्रकार के तुझ नचिकेता के प्रति मैं ब्रह्मभवन को खुले द्वारवाला अर्थात् अभिमुख हुआ मानता हूँ । अभिप्राय यह कि मैं तुझे मोक्ष के योग्य समझता हूँ ॥ १३ ॥
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एतदात्मतत्त्वं यदहं वक्ष्यामि तच्छ्रुत्वाचार्यप्रसादात्सम्यगात्मभावेन परिगृह्योपादाय मर्त्यो मरणधर्मा धर्मादनपेतं धर्म्यं प्रवृह्योद्यम्य पृथक्कृत्य शरीरादेः अणुं सूक्ष्ममेतमात्मानम् आप्य प्राप्य स मर्त्यो विद्वान्मोदते मोदनीयं हर्षणीयमात्मानं लब्ध्वा । तदेतदेवंविधं ब्रह्मसद्म भवनं नचिकेतसं त्वां प्रत्यपावृतद्वारं विवृतमभिमुखीभूतं मन्ये मोक्षार्हं त्वां मन्य इत्यभिप्रायः ॥ १३ ॥
[नचिकेता बोला—] भगवन्! यदि मैं योग्य हूँ और आप मुझपर प्रसन्न हैं तो—
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यद्यहं योग्यः प्रसन्नश्चासि भगवन्मां प्रति—