अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 14

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥

anyatra dharmādanyatrādharmādanyatrāsmātkṛtākṛtāt .
anyatra bhūtācca bhavyācca yattatpaśyasi tadvada .. 14 ..


जो धर्म से पृथक्, अधर्म से पृथक् तथा इस कार्यकारणरूप प्रपञ्च से भी पृथक् है और जो भूत एवं भविष्यत् से भी अन्य है—ऐसा आप जिसे देखते हैं वही मुझसे कहिये ॥ १४ ॥
जो धर्म यानी शास्त्रीय धर्मानुष्ठान, उसके फल तथा [कर्ताकरण आदि] कारकों से अन्यत्र—पृथग्भूत है, तथा जो अधर्म से भिन्न है और कृत—कार्य तथा अकृत—कारण इस प्रकार इस कार्य-कारण (स्थूल-सूक्ष्म प्रपञ्च) - से भी पृथक् है, यही नहीं भूत अर्थात् बीते हुए भव्य—आगामी तथा वर्तमान काल से भी अन्यत्र है; तात्पर्य यह है कि जो तीनों कालों से परिच्छिन्न नहीं है । ऐसी जिस सम्पूर्ण व्यवहारविषय से अतीत वस्तु को आप देखते हैं वह मुझसे कहिये ॥ १४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अन्यत्र धर्माच्छास्त्रीयाद्धर्मानुष्ठानात्तत्फलात्तत्कारकेभ्यश्च पृथग्भूतमित्यर्थः । तथान्यत्र अधर्मात्तथान्यत्रास्मात्कृताकृतात् कृतं कार्यमकृतं कारणमस्माद् अन्यत्र । किं चान्यत्र भूताच्चातिक्रान्तात्कालाद्भव्याच्च भविष्यतश्च तथा वर्तमानात्; कालत्रयेण यन्न परिच्छिद्यत इत्यर्थः । यद् ईदृशं वस्तु सर्वव्यवहारगोचरातीतं पश्यसि तद्वद मह्यम् ॥ १४ ॥

इस प्रकार पूछते हुए नचिकेता से, पूछी हुई वस्तु तथा उसके अन्य विशेषण को बतलाने की इच्छा से यमराज ने कहा—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
इत्येवं पृष्टवते मृत्युरुवाच पृष्टं वस्तु विशेषणान्तरं च विवक्षन्—

ओङ्कारोपदेश

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाग्ँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।

sarve vedā yatpadamāmananti tapāg̐si sarvāṇi ca yadvadanti .